क्या आपने मास्टर दा का नाम सुना है? – HindiLok.com


स्कूली जीवन में ही क्रांतिकारी विचारों की तरफ मुड़े सूर्या सेन शुरुआत में अनुशीलन नामक क्रांतिकारी दल से जुड़े और इसके बाद देश को आजाद कराने के लिए निकल पड़े। सूर्या सेन ने बतौर अध्यापक भी काम किया और उनका काम ब्रिटिश स्कूलों को भारतीय राष्ट्रीय स्कूलों में बदलना था। उन्होंने अपने पढ़ाने के अंदाज से छात्रों का इस कदर दिल जीता कि उनके साथ चलने के लिए छात्रों की लंबी फौज तैयार खड़ी हो गई। एक वक्त आया जब सूर्या सेन को लगा कि ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचार का अब डटकर सामना करना होगा और इसके लिए हथियारों की जरुरत होगी तो उन्होंने कुछ साथियों के साथ फरवरी 1930 में ब्रिटिश तोपखाने से हथियार लूटने की योजना बनायी। इस घटना को अंजाम देने के बाद चिट्टगोंग से लगी क्रांति की अलख पूरे बंगाल में फैलनी लगी। आलम ये कि ब्रिटिश सरकार ने उन्हें जिंदा या मृत पकड़ने के लिए उस वक्त दस हजार रुपए के इनाम की घोषणा की थी।

सूर्या सेन की पूरी जिंदगी में कई प्रेरक घटनाएं हैं। किस-किसका जिक्र करुं। चिट्टगोंग और पूरे बंगाल के लिए वो एक ऐसे हीरो हैं,जिनकी आज भी पूजा की जाती है। लेकिन, इसी सूर्या सेन को बंगाल के बाहर कितने लोग जानते हैं? उनकी शहादत से कितने लोग परीचित हैं? ये सवाल मुझे मथ रहा है। दरअसल, मैं अभी-अभी ‘चिटगोंग’ फिल्म की शूटिंग करके लौटा हूं। इस फिल्म में मैंने मास्टर दा उर्फ सूर्या सेन का किरदार निभाया है। इस शूटिंग को करते हुए बहुत आनंद आया। लेकिन, इसी दौरान इस सवाल ने उमड़ना शुरु किया कि ऐसा क्यों है कि सारा हिन्दुस्तान इतने बड़े क्रांतिकारी के योगदान से लगभग अनभिज्ञ है। जबकि पूरा बंगाल और बांग्लादेश उनकी पूजा करता है।
लेकिन, बात सिर्फ मास्टर दा के किरदार की नहीं है। भारतीय इतिहास में ऐसे किरदारों की लंबी फेहरिस्त है,जिन्हें रुपहले पर्दे पर फिर से जीवित किया जा सकता है। अच्छी बात यह है कि आज हर तरह की फिल्म के लिए बाजार तैयार है। वो दिन गए,जब निर्माता इन विषयों को हाथ लगाने से भी घबराते थे। आज हर नया विषय निर्माता-निर्देशक को लुभाता है क्योंकि उनका मानना है कि दर्शक अब नया देखना चाहते हैं। लेकिन, इस नए में मास्टर दा जैसे किरदार हों तो बात ही क्या।

हिन्दी फिल्मों पर अकसर इल्जाम लगता है कि वो युवा मस्तिष्क को बिगाड़ देते हैं। भटका देते हैं। लेकिन एक सत्य ये भी है कि आज फिल्में ही करोड़ों लोगों तक हिन्दी भाषा को लेकर जाती हैं। आज फिल्में ही भगत सिंह और मास्टर दा जैसे महापुरुषों के बारे में लोगों को सोचने पर मजबूर करती है। उम्मीद है कि चिटगोंग और मास्टर दा के बहाने लोग इस महान क्रांतिकारी के बारे में जानेंगे और फिर इस तरह की और भी फिल्में बनेंगी।

फिलहाल, मैं अपने निर्णय से बहुत खुश हूं कि मैंने मास्टर दा का किरदार निभाया। उनके किरदार को करते हुए बहुत कुछ सीखा है। उनको जानने की भरपूर कोशिश की है। और जब मैं दिल्ली लौटा हूं इस फिल्म की शूटिंग के बाद तो बिना सूर्या सेन उर्फ मास्टर दा के खुद को अकेला महसूस कर रहा हूं।

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One response to this post.

  1. जी हां मैं तो परिचित हूं। जब पांचवी क्लाम में था तब से ही।

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