मानव अपने पुरे जीवन काल में…………


मानव अपने पुरे जीवन काल में कई अवस्थाओं से होकर  गुज़रता  है . जिसमे ब्ल्यावास्था वो अवस्था है जिसमे शिशु संपूर्ण रूप से अपने माता – पिता पर निर्भर रहता है  अर्थात अभिभावक अपने अनुसार शिशु का पालन पोषण करता है . तत्पश्चात वह बाल्यावस्था में प्रवेश करता है और  अपनी पसंद – नापसंद दर्ज कराने की कोशिश करता है . माता-पिता के ना सुनना पसंद नशीं करता सोचता है मम्मी पापा गलत है उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए .और इस तरह किशोरावस्था तक आते-आते वह माता-पिता हो गलत ठहराने को अपनी शान समझता है चूँकि वो स्वयं दिग्भ्रमित रहता है इसलिए बड़ों की हर बातें उसे नागवार लगती है और सोचता है की कितने पुराने खयालात है इनके मैं अपने बच्चों के साथ ऐसा हरगिज़ नहीं करूंगा . और इसतरह वह युवावस्था की ओर बढ़ जाता है . इस अवस्था में वह पढ़ाई और नौकरी को लेकर इस कदर उलझा रहता है की माँ बाप की हर बातें उसे उपदेश लगता है और और झुंझलाकर कहता है अब दिन पुराने जैसे नहीं रहे मुझे नहीं आपको अपने आप को बदलना पडेगा . लेकिन जैसे-जैसे वह गृहस्थ  जीवन की ओर अग्रसर होता है उसे अपने माँ बाप सही लगने लगते है . उनके हर आदर्ष अपनाने के लिए अपने बच्चों को प्रोत्साहित किया जाता है . और उमरा बढ़ने के साथ-साथ वह मानने लगता है की वो ही गलत था बल्कि उसके माँ-बाप ही सही थे .

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