उफ़ ! ये गरमी


खिड़की से झांकती ये चिलचिलाती धूप 
ये अलसाए से दिन बेरंग-बेरूप 
सामने है कर्त्तव्य पर्वत-स्वरुप 
निकलने न दे घर से ये चिलचिलाती धूप 
ये आंच ये ताप कब होगा समाप्त 
झुलसती ये गरमी बरस रही है आग 
धूप के कहर ने तो ले ली कई जानें 
निकलना हुआ  मुश्किल सोचें है कई बहाने 
हे सूर्य देव तुम कब तरस खाओगे 
हे इन्द्र देव तुम कब बरस जाओगे 
देती हूँ निमंत्रण बरसो झमाझम 
धूप का प्रकोप जिससे कुछ हो जाए कम 
सूर्य देव का आतिथ्य हमने सहर्ष स्वीकारा 
पर अतिथि रहे कम दिन तो लगे सबको प्यारा 
आपका आना तो  अवश्यम्भावी है 
नियमानुसार अब आपकी बारी है 
आपके स्वागत में है पलकें बिछाए 
खुली है  खिड़की  कब आप दरस जाए 
बारिस के  बूंदों की फुहार याद आये 
देर न करिए आयें और बरस जाएँ 
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8 responses to this post.

  1. Indra dev ko Bangalore wasion ka amantran!

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  2. bahut khoobi se dil ki baat kah di!

    Reply

  3. bahut khoob! dil ki baat kah di.

    Reply

  4. yahi chah hai kab baarish ho kab garmi se chutkaara mile…sundar kavita

    Reply

  5. शब्द पुष्टिकरण हटा दे ,,,टिपण्णी देने में दिक्कत हो रही है

    Reply

  6. सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है।

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  7. गरमी में गरम-गरम रचना का अच्छा शीतल अंत किया है ,,,,,सुन्दर रचना …सुन्दर मन के सुन्दर भावो के साथ

    Reply

  8. काफी सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया है आपने अपनी कविताओ में सुन्दर अति सुन्दर

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