‘ध्रुवतारा’



तारा टूटा है दिल तो नही 
चहरे पर छाई ये उदासी क्यों 
इनकी तो है बरात अपनी 
तुम पर छाई ये विरानी क्यों 


न चमक अपनी इन तारों की 
न रोशनी की  राह दिखा सके 
दूर टिमटिमाती इन तारों से 
तुम अपना मन बहलाती क्यों 
कहते है ये टूटते तारे 
मुराद पूरी करता जाय 
पर नामुराद मन को तेरी 
टूटते हुए छलता  जाए क्यों 


मत देखो इन नक्षत्रों को 
इसने सबको है भरमाया 
गर देखना ही है देखो उसे 
जो अटल अडिग वो है ‘ध्रुवतारा’

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3 responses to this post.

  1. ग़ालिब की मगर मुश्किल ये है, की बहुत निकले अरमाँ मगर फिर भी कम निकले!सुन्दर अभिव्यक्ति.

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  2. sundar bhaav prastuti.

    Reply

  3. very nice and touchykam shabdon men bahut badee baat likhee hai मत देखो इन नक्षत्रों को इसने सबको है भरमाया गर देखना ही है देखो उसे जो अटल अडिग वो है 'ध्रुवतारा

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