मै और मेरी तन्हाई


इस सूने कमरे में है बस
मै और मेरी तन्हाई
दीवारों का रंग पड गया फीका
थक गयी आँखे पर वो न आयी
छवि जो उसकी दिल में समाया
दीवारों पर टांग दिया
तू नही पर तेरी छवि से ही
टूटे मन को बहला लिया
पर क्या करूँ इस अकेलेपन का
बूँद-बूँद मन को रिसता है
उस मन को भी न तज पाऊँ मै
जिस मन में वो छब बसता है
शायद वो आ जाए एक दिन
एकाकी घर संवर जाए
इस निस्संग एकाकीपन को
साथ कभी तेरा मिल जाए
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2 responses to this post.

  1. kam shabdon mainsundar rachnaश्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई ।

    Reply

  2. खूबसूरत अभिव्यक्ति ..कमेन्ट बॉक्स से वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें …टिप्पणी करना मुश्किल होता है ..

    Reply

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