रात का सूनापन


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रात का सूनापन

मेरी जिन्दगी को सताए

दिन का उजाला भी

मेरे मन को भरमाये

क्यों इस जिन्दगी में

सूनापन पसर गया

खिलखिलाती ये जिन्दगी

गम में बदल गया

आना मेरी जिन्दगी में तेरा

एक नया सुबह था

वो रात भी नयी थी

वो वक्त खुशगवार था

वो हाथ पकड़ कर चलना

खिली चांदनी रात में

सुबह का रहता था इंतज़ार

मिलने की आस में

पर जाने वो हसीं पल

मुझसे क्यों छिन गया

जो थे इतने पास-पास

वो अजनबी सा बन गया

मेरे अनुरागी मन को

बैरागी बना दिया

रोग प्रेम का है ही ऐसा

कभी दिल बहल गया

कभी दिल दहल गया

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5 responses to this post.

  1. pya ki har dasha ka bahoot hi sunder varnan……upendra ( http://www.srijanshikhar.blogspot.com )

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  2. वाह क्या बात है … दिल का रोग लग जाए तो ऐसा ही होता है … अच्छी रचना है ….

    Reply

  3. बहुत उम्दा अभिव्यक्ति.

    Reply

  4. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 7- 9 – 2010 मंगलवार को ली गयी है …कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ …शुक्रिया http://charchamanch.blogspot.com/

    Reply

  5. प्रेम रोग की खासियत बताती बढ़िया रचना …

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