मन बंजारा


मेरे इस रेगिस्तान मन में
 बूँद प्यार का गर टपक जाए
  रेत गीली हो जाय
   दिल का दामन भर जाय

    जन्मों से प्यासे इस मन को
     प्यार का जो सौगात मिला
      मन पंछी बन उड़ जाए
       रहे न जीवन से गिला

        जाने क्यों मन भटका जाय
         ढूंढे किसे ये मन बंजारा
          है आवारा बादल की तलाश
           पाकर मन कहे ‘मै हारा’

             इतना प्यार उड़ेलूँ उसका ..
              आवारापन संभल जाए
               वो बूँद बन जाए बादल का
                और इस सूखे मन में टपक जाए

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11 responses to this post.

  1. इतना प्यार उड़ेलूँ उसका ..आवारापन संभल जाएवो बूँद बन जाए बादल काऔर इस सूखे मन में टपक जाएबहुत ही सुंदर …

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  2. भावपूर्ण अभिव्यक्ति .धन्यवाद

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  3. बहुत सुन्दर रचना.

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  4. bahoot hi ahchhi ummid…. jaroor puri ho

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  5. सुंदर अभिव्यक्ति ।

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  6. sunder abhivykti.

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  7. आप की रचना 24 सितम्बर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.http://charchamanch.blogspot.comआभार अनामिका

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  8. very nice, thanks !

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  9. सही कहा, मन बंजारा है, इधर-उधर भागता रहता है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है। अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-2, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

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  10. इतना प्यार उड़ेलूँ उसका .. आवारापन संभल जाए वो बूँद बन जाए बादल का और इस सूखे मन में टपक जाएबहुत ही सुंदर पंक्तियां…http://veenakesur.blogspot.com/अगर वीणा के सुर पसंद आए तो फॉलो कर उत्साह बढ़ा सकती हैं

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