बचपन की यादे


बचपन की यादो को कैसे भुलाए 
मम्मी की डांट और पापा बचाए 
चुपके से मम्मी से नज़रे चुराकर 
कोमिक्स किताबों के बीच में रखकर 
पढता था खूब पर जब पकड़ा जाता था 
होती थी जमकर धुनाई फिर क्या था 
पर बचपन में बच्चो को शरारत पर हक़ है 
मात देना है माँ को सलाह्कार बहुत है 
माँ के पिटाई के खिलाफ हम एक है 
चिंटू पिंटू राजू पीड़ित अनेक है 
फैसला किया था हमने सब मिलकर 
पीटना नहीं इसबार अड़ना है डटकर 
किसकी हिम्मत है हमपर हाथ उठाये 
पर फैसला ये मम्मी को कैसे बताये 
वैसे तो पापा थे पक्षधर हमारे 
पर मम्मी के आगे थे अलग ही नज़ारे 
समझ आया मम्मी के आगे नही बिसात किसी की 
धरी रह गयी योजना , ये थी यादे बचपन की 

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4 responses to this post.

  1. बचपन पर कितनी प्यारी कविता लिखी आपने……अच्छी …..

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  2. ऐसी ही होती हैं बचपन की यादें……बहुत अच्छी रचना

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  3. आपको नवरात्र की ढेर सारी शुभकामनाएं .

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  4. बहुत रोचक और सुन्दर अंदाज में लिखी गई रचना …..आभार

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