चढ़कर इश्क की



चढ़कर इश्क की कई मंजिले
अब ये समझ आया
इश्क के दामन में फूल भी है
और कांटे भी
और मेरे हाथ काँटों भरा
फूल आया
————-
फूल सा इश्क पाकर
फूला न समाया
पर बेवफाई का काँटा हर फूल ने
ज़रूर चुभाया
—————-
अब तो मेरी हालत देख
दोस्त ये कहे
इश्क का तो यही ताकाज़ा है
तेरा दिल हर फूल पे
क्यों आया

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15 responses to this post.

  1. यही इश्क है……….:)

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  2. बहुत ही सुन्दर रचना| धन्यवाद|

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  3. sundar abhivyakti…….bahut khub!!prem bhari rachna:)

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  4. .प्रेम की कशिश बिना दर्द के महसूस नहीं की जा सकती.प्रेम तो आंसू है , पीड़ा है ……..

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  5. अच्छा लगा

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  6. Absolutely love it! Nice one:)

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  7. phool ki khoobsurati aankhon par pattin bandh deti hai aur nazar uske saath jude kaantein dekh nahi paati … bahut khoobsurat rachna …

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  8. तेरा दिल हर फूल पर क्यूं आया। सुन्दर पंक्ति , ख़ूबसूरत कविता।

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  9. प्रेम का प्राप्य तो आंसू, पीड़ा और एक कभी न खत्म होने वाली टीस है और उसी में उसकी सार्थकता छिपी हुई है. खूबसूरत रचना. आभार.सादर डोरोथी.

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  10. सुन्दर क्षणिकाएं हैं !

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  11. वाह जी बल्ले बल्ले शेर हैं

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  12. यही दस्तूर है मुहोब्बत का एक तरफ वफ़ा तो दूसरे पहलु में जफा को बाँध लाएगी.यादो में वफ़ा के जी सके तो जो बेवफाई वर्ना मार जायेगी.

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  13. काँटे ही फूल की अहमियत बताते हैं

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  14. बेहतरीन रचना…यह ख़ूबसूरत रचना के लिए बधाई…

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  15. बहुत ही सुन्दर भावनापूर्ण अभिव्यक्ति…प्रेम की कशिश बिना दर्द के महसूस नहीं की जा सकती…अति सुन्दर…आभार

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