एक सन्देश मोबाईल से…………


ज़िंदा थे तो किसी ने पास भी नही बिठाया 
अब सब पास बैठे जा रहे थे 
पहले किसी ने रुमाल भी नही दिया 
अब कपडे ओढाये जा रहे थे 
सबको पता है अब उनके काम के नही हम 
फिर भी बेचारे दुनियादारी निभाये जा रहे थे 
ज़िंदा थे तो किसी ने कदर नही की 
अब मुझमे घी डाले जा रहे थे 
ज़िंदगी में एक कदम साथ नही चला कोई 
अब फूलो से सजा के कंधे पर ले जा रहे थे 
अब पता चला मौत कितनी बेहतर है ज़िंदगी से 
हम तो यूं ही जिए जा रहे थे 


—————–अज्ञात 

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7 responses to this post.

  1. मर्म को बेधने वाली रचना।

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  2. एक कटु सत्य.इंसान की अमूमन मरने के बाद ज्यादा कद्र होती है

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  3. मर्म को बेधने वाली रचना। रचनाकार को प्रणाम।-डॉ० डंडा लखनवी=======================मुनाफ़ा============नए दौर में ये इजाफा हुआ है।जो बोरा था वो अब लिफाफा हुआ है॥जिन्हें लत पड़ी थूकने – चाटने की-वो कहते हैं इससे मुनाफा हुआ है॥ -डॉ० डंडा लखनवी

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  4. अब पता चला मौत कितनी बेहतर है ज़िंदगी से हम तो यूं ही जिए जा रहे थे bahoot khoob.

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  5. mujhe bhi sms ke roop me mili thi ye rachna.. great one.. and so true.. 🙂

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  6. @ अना जी क्या खूब कहा…. ये दुनिया है ही ऐसी………मेरे ब्लॉग सृजन_ शिखर पर " हम सबके नाम एक शहीद की कविता "

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