यारा लगा मन………..


 ..
यारा लगा मन फकीरी में 
न डर खोने का 
न खुशी कुछ पाने का 
ये जहां है अपना 
बीते न दिन गरीबी में 
यारा लगा मन फकीरी में 

जब से लागी लगन उस रब से 
मन बैरागी सा हो गया 
पथ-पथ घूमूं ढूंडू पिया को 
ये फकीरा काफ़िर बन गया 

मन फकीरा ये जान न पाए 
आखिर उसे जाना है कहाँ 
रब दे वास्ते ढूंडन लागी 
रास्ता-रास्ता गलियाँ-गलियाँ 

क्या करूँ कुछ समझ न आये 
उस रब दे मिलने के वास्ते 
ढूँढ लिया सब ठौर-ठिकाने 
गली,कूचे और रास्ते 

जाने कब जुड़ेगा नाता 
और ये फकीर तर जावेगा 
सूख गयी आँखे ये देखन वास्ते 
रब ये मिलन कब करवावेगा
 ..
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6 responses to this post.

  1. bahut sunder kavita hai aapkimai aapko follow kar rhi hukabhi yaha bhi aayewww.deepti09sharma.blogspot.com

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  2. जब से लागी लगन उस रब से मन बैरागी सा हो गया पथ-पथ घूमूं ढूंडू पिया को ये फकीरा काफ़िर बन गया अना जी, गहरे भाव है कविता में ……सुंदर प्रस्तुति..नये दसक का नया भारत (भाग- १) : कैसे दूर हो बेरोजगारी ?

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  3. बहुत सुन्दर !

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  4. अति सुन्दर,रब को पाना ही इस नश्वर शरीर का उद्देश्य होना चाहिएबधाई

    Reply

  5. यारा लगा मन फकीरी में न डर खोने का न खुशी कुछ पाने का ये जहां है अपना बीते न दिन गरीबी में kya baat kah di….sab aisa sochne lage to fir to duniya hi badal jayegi…bahut khub!!

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