जाह्नवी हूँ ………


 मै नदी हूँ ………….
पहाड़ो से निकली 
नदों से मिलती 
कठिन धरातल पर              
उफनती उछलती 
प्रवाह तरंगिनी हूँ 
                                   

परवाह किसे है 
ले चलती किसे मै 
रेट हो या  मिटटी   
न छोडूँ उसे मै 
तरल प्रवाहिनी हूँ 
                               
राह बनाती 
सागर जा मिलती 
 पर्वत से अमृत को 
लेकर मै चलती 
न आदि न अंत 
शिव जटा से प्रवाहित           
जाह्नवी हूँ 
                                      
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16 responses to this post.

  1. क्यूं भ्रम में रखते हैं आप शब्द आपके भी कम नहींदिल सबका लुभाते हम तो यूँ ही लिख देते ख्याल जो जहन में आतेनिरंतर खुद को बहलाते कलम फिर भी आप जैसी चलती कहाँ Aapke comments ke liye dhanyawaad

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  2. मान गए भाई दमदार लेखनी है।

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  3. राह बनातीसागर जा मिलतीपर्वत से अमृत कोलेकर मै चलतीन आदि न अंतशिव जटा से प्रवाहितजाह्नवी हूँ बहुत सुन्दर ……….बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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  4. सुन्दर अभिव्यक्ति. गांधीविचार

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  5. सुन्दर अभिव्यक्ति.gandhivichar

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  6. अत्यंत खूबसूरत भावाभिव्यक्ति, शुभकामनाएं.रामराम.

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  7. बहुत खूब लिखा है आपने…अति उत्तम!!!मेरा ब्लॉग भी देखे….http://nimhem.blogspot.com/

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  8. बहुत सुन्दर भाव। धन्यवाद|बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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  9. बहुत सुन्दर भाव्।बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  10. राह बनाती सागर जा मिलती पर्वत से अमृत को लेकर मै चलती न आदि न अंत शिव जटा से प्रवाहित जाह्नवी हूँ बहुत सुन्दर !

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  11. राह बनाती सागर जा मिलती पर्वत से अमृत को लेकर मै चलती न आदि न अंत शिव जटा से प्रवाहित जाह्नवी हूँ Beautiful expression !.

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  12. Nice post.यदि आप 'प्यारी मां' ब्लॉग के लेखिका मंडल की सम्मानित सदस्य बनना चाहती हैं तो कृपया अपनी ईमेल आई डी भेज दीजिये और फिर निमंत्रण को स्वीकार करके लिखना शुरू करें.यह एक अभियान है मां के गौरव की रक्षा का .मां बचाओ , मानवता बचाओ . http://pyarimaan.blogspot.com/2011/02/blog-post_03.html

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  13. very very good poem

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  14. अच्छा लिखा है ……

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  15. पर्वत से अमृत को लेकर मै चलती न आदि न अंत शिव जटा से प्रवाहित जाह्नवी हूँ बहुत सुन्दर भाव। बधाई इस रचना के लिये।

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