रैन जलती….



रैन जलती रही 
ख्वाब पलती रही 
आंसूओ के सैलाब से 
नैन सिलती रही 

सपने पले थे जो 
पलकों  पर ठहर सी गयी 
तारे भी आसमा पर ही 
जाने क्यों ठिठुर सी गयी 

दर्द भरी लोरिया भी 
आँखों को सुला न पाया 
सुबह का सूरज भी 
दुनिया सजा न पाया 

बारिश की बूंदे भी 
इस मन को न भर पाया 
ये प्रेम की तड़पन है 
न ये जल पाया न बुझ पाया 
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10 responses to this post.

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति….प्रेम-अग्न की तड़प को बखूबी शब्दों में उकेरा है आपने

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  2. बारिश की बूंदे भी इस मन को न भर पाया ये प्रेम की तड़पन है न ये जल पाया न बुझ पाया खुबसुरत नज्म। बेहतरीन एहसास। आभार।

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  3. आना जी बेहतरीन शब्दांकन, संवेदना से भरी रचना शुभकामनायें

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  4. वाह बहुत सुंदर

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  5. आपकी सुन्दर प्रस्तुति का जवाबप्रेम में जीने वालों कीतड़प कभी कम नहीं होती आग दिल की कभी ना बुझती प्रेम को खुदा मानने वालों की इबादत बिना प्रेम अधूरी रहती किश्ती को साहिल मिल भी जाए तो भी नींद निरंतर कहाँ आती सुबह-ओ-शाम एक ही धुन सवार रहती प्रेम की ख्वाइश में ज़िन्दगी ख़त्म होती27-03-03डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर523—193-03-11

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  6. बहुत खूब बहुत बहुत शुभकामनाये

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  7. Very intense expression of feelings. Loved the lines and the opening lines of Harivanshrai Bachchan too 🙂

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