मेरे ज़ख्मो को……





मेरे ज़ख्मो को सहलाने की कोशिश न करो 
मेंरे दर्द को बहलाने की साजिश  न करो 
मुझे तुमसे जो दर्दें  सौगात में मिली है 
उन पर मलहम लगाने  की ख्वाहिश न करो 

अश्कों को तो … पी लिया मैंने 
रिश्ता जो था … तोड़ लिया मैंने 
अब इन रिश्तो के दरार को 
प्यार  से भरने की कोशिश न करो 

आंसूओं  के समंदर में डूब गया जो दिल 
सपनो के खँडहर में दब गया जो पल 
तन्हाइयों के दरख्तों में जो नींव बनाया मैंने 
उस आशियाने को उजाड़ने…..आया मत करो 


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12 responses to this post.

  1. bahut sundar abhibykti

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  2. वाह वाह क्या बात कही है आपनेदिल से निकली और सीधे दिल में उतर गयी

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  3. अंतर्मन की नाज़ुक भावनाओं पर आधारित यह कविता दिल को छू गयी.आभार. बहुत-बहुत शुभकामनाएं .

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  4. तन्हाइयों के दरख्तों में जो नींव बनाया मैंने उस आशियाने को उजाड़ने…..आया मत करोसुंदर पंक्तियां

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  5. bhut hi dard bhari aur bhaavpur panktiya hai…

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  6. प्यार में दिल पे लगे जख्म इतनी आसानी से कहॉ मिटते है।

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  7. मुझे तुमसे जो दर्दें सौगात में मिली है उन पर मलहम लगाने की ख्वाहिश न करो सुंदर पंक्तियां…

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  8. क्यूँ…???आखिर क्यों…ऐसा न करें..:)एक प्रभावशील रचना…

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  9. अच्छी अभिव्यक्ति……..

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  10. सुभानअल्लाह

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  11. मेरे ज़ख्मो को सहलाने की कोशिश न करो मेंरे दर्द को बहलाने की साजिश न करो मुझे तुमसे जो दर्दें सौगात में मिली है उन पर मलहम लगाने की ख्वाहिश न करो …आदत है इनको जीने की और सच भी है कि ऐसे घाव नहीं भरते

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  12. तन्हाइयों के दरख्तों में जो नींव बनाया मैंने उस आशियाने को उजाड़ने…..आया मत करोबहुत बढ़िया पंक्तियाँ हैं.सादर

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