स्मृतियों के दलदल में….



स्मृतियों के दलदल में
यादों के गुलशन में
सपनो के महफ़िल में
 नाम तेरा ही छुपा है


नक्षत्रों के अक्ष पर
मैंने अपने वक्ष पर
धरा ने अपने कक्ष पर
नाम तेरा ही लिखा है

सूरज के किरणों में
चंदा के चांदनी में
तारों के रोशनाई में
नाम तेरा ही रोशन है


चढ़कर समय रथ पर
फूलों से सजे पथ पर
हाथ पर हाथ धरकर
पी के संग जाना है

मुड़कर न देखूं मै
जो बढ़ाये कदम मैंने
जन्मो का बंधन है
संग संग जीना है 
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10 responses to this post.

  1. वाह ..बहुत खूब कहा है आपने … बेहतरीन ।

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  2. नक्षत्रों के अक्ष परमैंने अपने वक्ष परधरा ने अपने कक्ष परनाम तेरा ही लिखा हैवाह लाजवाब पंक्तियाँ हैं अन्य पोस्ट भी पढ़े मकड़ी और माखी संवाद पढकर मजा आया

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  3. खुबसुरत रचना।

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  4. बहुत सुंदर रचना, विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  5. * नक्षत्रों के अक्ष परमैंने अपने वक्ष परधरा ने अपने कक्ष परनाम तेरा ही लिखा है ||बहुत ही अच्छी रचना है…

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  6. बहुत खोब .. हर सू वो ही वो हैं .. उनका ही नाम है … लाजवाब रचना है ..

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  7. हाथ पर हाथ धरकरपी के संग जाना है ||बहुत अच्छे ! साथ जीने का बहाना है ||* नक्षत्रों के अक्ष पर मैंने अपने वक्ष पर धरा ने अपने कक्ष पर नाम तेरा ही लिखा है ||बनाइये मत— हैं बड़े दक्षपिय के समक्ष ये पाती प्रत्यक्ष– आपने लिखा है ||

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  8. नक्षत्रों के अक्ष परमैंने अपने वक्ष परधरा ने अपने कक्ष परनाम तेरा ही लिखा हैamazing

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  9. मुड़कर न देखूं मैजो बढ़ाये कदम मैंनेजन्मो का बंधन हैसंग संग जीना है…. waah! bhut sunder hai…

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