तन्हाइयों में रोकर…


तन्हाइयों में रोकर दिल बहलाते है 
बिखरे ग़म को सिलकर ग़ज़ल बनाते है 

यादें जो तुमसे है जुड़ी वो अक्सर छेड़ जाते है 
तेरी यादों के बज़्म में हम खो जाते है 

शबनम का कतरा….. दरिया बनाती है 
आस तुमसे मिलने की किनारा दिखाती है 

शबनम के कतरे को यूं बेकार न समझो 
इस नासूर दिल को ये मरहम लगाती है 

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12 responses to this post.

  1. अच्छी गज़ल

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  2. अच्छी गज़ल,अच्छे अशआर.

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  3. मन के भावों को सजीव करती अच्छी गज़ल

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  4. बेहद खुबसुरत गजल। आभार।

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  5. sundar abhivyakti .aabhar

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  6. बेहतरीन.कल 12/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!

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  7. गम की कतरनों से बनी ग़ज़ल अच्छी है

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  8. बहुत खूब….

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  9. ravikar ne –रचना के लिए बधाई ||

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  10. शेर अच्छे है मुबारक हो

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