हे कवि बजाओ…


स्वतन्त्रता दिवस के उपलक्ष्य पर प्रस्तुत है मेरी ये  कविता 


हे कवि बजाओ मन वीणा 
छेड़ो तुम जीवन के तान 
शब्द शिखर पर आसीन हो तुम
छेड़ो तुम जन-जन का गान 

गीत छेड़ो स्वतन्त्रता के
झूठ छल-कपट का हो अवसान 
सत्य अहिंसा ईमान का
जग में करना है उत्थान 

मौन रह गए गर तुम कविवर 
छेड़ेगा कौन सत्य अभियान 
कलम को हथियार बनाकर 
करो जन-जन का आहवान

उठो -जागो लड़ो-मरो 
करो देश के लिए बलिदान 
कवि तुम चुप न रहो -कह दो 
सत्य राह हो सबका ध्यान


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8 responses to this post.

  1. bahut hi sundar likha hai kavi ke marm ko aur samjh skta hai….

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  2. उठो -जागो लड़ो-मरो करो देश के लिए बलिदान कवि तुम चुप न रहो -कह दो सत्य राह हो सबका ध्यानसही समय पर सही सन्देश देती बेहतरीन रचना. बधाई.स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें.

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  3. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 15-08-2011 को चर्चा मंच http://charchamanch.blogspot.com/ पर भी होगी। सूचनार्थ

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  4. कलम को हथियार बनाकर करो जन-जन का आहवानसच कहा…. सुन्दर लेखन…सादर..

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  5. बहुत सुन्दर आह्वान्।

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  6. सुन्दर भावों से आह्वान

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  7. उठो -जागो लड़ो-मरो करो देश के लिए बलिदान कवि तुम चुप न रहो -कह दो सत्य राह हो सबका ध्यानgood lines,

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