दिग्भ्रमित सी दिशाएँ


दिग्भ्रमित सी दिशाएँ है 
छाया कुहासा चारों और 
दीपशिखा को कुचला किसने 
धुआं का कहीं न और छोर 
                 अन्धतम इतनी गहराई  
                  ज्योत भी मंद पड़ गया 
               बुझ गया दीपक था जिसमे 
               तेल–जीवन बह गया 
वायु में है वेग इतना 
नाव भी भटके है मार्ग 
मंझधार में है या किनारे 
या भंवर में फंसा है नाव 
               ईश से है ये गुजारिश 
               भाग्य में लिख दे यही 
                विपद से रक्षा नहीं !
                मांगू मैं  डरने की सीख 
      

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13 responses to this post.

  1. दीवाली की व्यस्तता में कई दिनों के बाद समय मिला…. शुभकामनाएं….आपको परिवार समेत….!!***punam***bas yun…hi..tumhare liye…

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  2. खूबसुरती से लिखी गई भाव पूर्ण सुंदर रचना,बढ़िया पोस्ट…बधाई

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  3. bahut sundar bhaav purn abhivyakti….saadar !!!

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  4. बहुत सुन्दर उम्दा रचना है …

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  5. खुबसूरत प्रस्तुति ||आभार|शुभकामनायें ||

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  6. बढ़िया प्रस्तुति way4hostRajputsParinay

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  7. बढिया प्रस्‍तुति।

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  8. हालात का दिग्दर्शन

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  10. bhaut hi khubsurat….

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  11. "पर्व नया-नित आता जाता" उच्चारण पर लिखा जो कहीं कोई याद करता ,थके क़दमों से दिखा बिखरे बिखरे विचार कुछ हैं, वो दिल से रहा बता |दिग्भ्रमित सी देख दिशाएँ, अब बदली रही सता || आपकी उत्कृष्ट पोस्ट का लिंक है क्या ??आइये –फिर आ जाइए -अपने विचारों से अवगत कराइए ||शुक्रवार चर्चा – मंचhttp://charchamanch.blogspot.com/

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  12. मैं मांगू न डरने की सीख ..बढिया प्रस्‍तुति !!

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