मैं जिंदा हूँ


मैं जिंदा हूँ 
अन्याय का खिलाफत मैं कर नहीं पाता
कुशासन-सुशासन  का फर्क समझ नहीं पाता 
प्रदूषित हवा में सांस लेता हूँ 
पर मैं जिंदा हूँ 

सरकारी तंत्र से शोषित हूँ मैं 
बिना सबूत आरोपित हूँ मैं
खुद को  साबित मैं  कर नहीं पाता 
पर मैं जिंदा हूँ 

दिल से चीत्कार उठती है 
मन में हाहाकार मचती है 
होंठों से कोई शब्द निकल नहीं पाता 
पर मैं जिंदा हूँ 

रक्त में उबाल अब भी है 
भावनाओं में अंगार अब भी है 
बस विद्रोह के स्वर गा नहीं पाता 
पर मैं जिंदा हूँ 

क्यों डरता हूँ इस झूठे तंत्र से 
काश मन जागृत हो कोई मन्त्र से 
नष्ट कर दूं उन कुकर्मियों  का ,
एक भीड़ मैं जुटा नहीं पाता 
पर मैं जिंदा हूँ 
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24 responses to this post.

  1. क्यों डरता हूँ इस झूठे तंत्र से काश मन जागृत हो कोई मन्त्र से नष्ट कर दूं उन कुकर्मियों का ,एक भीड़ मैं जुटा नहीं पाता पर मैं जिंदा हूँ vah bahut hi sundar kriti shukl ji ….badhai ke sath abhar.

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  2. BAS THODA HI DOOR HO….MANZIL SE….THODI SI HIMMAT KAR LO….FIR SACHHE MAAYNO ME JINDA RAHOGE.SUNDER SATEEK PRASTUTI.

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  3. सुंदर प्रस्तुति !

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  4. मकर संक्रांति की हार्दिक शुभ कामनाएँ।—————————- आज 15/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!

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  5. अच्छी कविता है…

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  6. रक्त में उबाल अब भी है भावनाओं में अंगार अब भी है बस विद्रोह के स्वर गा नहीं पाताआपकी कविताओं में ओज रस है ….जागृत स्वर …..

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  7. sartajk rachna ke liye aabhar

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  8. संदेषपूर्ण व यथार्थपरक कविता ।

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  9. क्यों डरता हूँ इस झूठे तंत्र से काश मन जागृत हो कोई मन्त्र से नष्ट कर दूं उन कुकर्मियों का ,एक भीड़ मैं जुटा नहीं पाता पर मैं जिंदा हूँ ..आम आदमी की बेबसी का बयां करती भावपूर्ण अभिव्यक्ति .सादर!!श्रीप्रकाश डिमरी

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  10. aam insan ki vivshta bakhoobi vyakt hui hai..

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  11. रक्त में उबाल अब भी है भावनाओं में अंगार अब भी है यकीनन यह जिन्दा होने का प्रमाण है

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  12. बहुत सुंदर शब्दों द्वारा अच्छी अभिव्यक्ति की है. पढकर लगा मेरी ही परिस्थितियों पर लिखी गई है. आप बेशक मेरी स्थिति को मेरे ब्लोगों को पढकर अनुभव किया जा सकता है. बस थोड़ा-सा अंतर है, अपनी लेखनी से जितना हो सकता है. उतना अन्याय का विरोध जरुर कर रहा हूँ.मैं जिंदा हूँ अन्याय का खिलाफत मैं कर नहीं पाताकुशासन-सुशासन का फर्क समझ नहीं पाता प्रदूषित हवा में सांस लेता हूँ पर मैं जिंदा हूँ सरकारी तंत्र से शोषित हूँ मैं बिना सबूत आरोपित हूँ मैंखुद को साबित मैं कर नहीं पाता पर मैं जिंदा हूँ दिल से चीत्कार उठती है मन में हाहाकार मचती है होंठों से कोई शब्द निकल नहीं पाता पर मैं जिंदा हूँ रक्त में उबाल अब भी है भावनाओं में अंगार अब भी है बस विद्रोह के स्वर गा नहीं पाता पर मैं जिंदा हूँ क्यों डरता हूँ इस झूठे तंत्र से काश मन जागृत हो कोई मन्त्र से नष्ट कर दूं उन कुकर्मियों का ,एक भीड़ मैं जुटा नहीं पाता पर मैं जिंदा हूँ

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  13. इंसान कितना विवश है … चाहते हुवे भी कुछ कर नहीं पाता इस तंत्र में … सही लिखा है …

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  14. सुंदर प्रस्‍तुति। भावों का बेहतरीन चित्रण।

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  15. सुंदर प्रस्‍तुति। मन के भीतर के भावों का बेहतरीन चित्रण।

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  16. आज के परिवेश का सटीक चित्रण…***punam***bas yun..hi…tumhare liye…

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  17. इसी विवशता से जब संकल्प जन्मेगा तब जीवन सार्थक होगा!

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  18. मर्मस्पर्शी और भावनात्मक प्रस्तुति Gyan DarpanRajputsParinay

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  19. हरेक पंक्ति बहुत मर्मस्पर्शी है। कविता अच्छी लगी । संजय भास्करआदत….मुस्कुराने कीपर आपका स्वागत हैhttp://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  20. sarthak abhivaykti…

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  21. उफ़ आम आदमी की विवशता का सटीक चित्रण किया है।

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  22. रक्त में उबाल अब भी है भावनाओं में अंगार अब भी है बस विद्रोह के स्वर गा नहीं पाता पर मैं जिंदा हूँ jo kunthaaon ko janm de raha

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  23. सुन्दर भावनात्मक प्रस्तुति , बधाई.

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