कोयल की कूक


गूंजे कोयल की कूक से
जंगल में मीठी तान
पवन चले मंद मंद
गाये दादुर गान ,


आम्र मंजरी के महक से
महके वन-वनांतर
पथिक का प्यास बुझाए
नदी बहे देश-देशांतर


पक्षियों के कलरव से
गूंजे धरती आसमान
पुष्प-पुष्प सुगंध से
महकाए ये जहान


बेशक ये बयार भी
हृदयों को मिलाये
पत्तों के झुरमुट से
चाँद भी झिलमिलाये 

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21 responses to this post.

  1. सुन्दर रचना

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  2. दिनांक 13/01/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .धन्यवाद! ऎसा क्यूँ हो जाता है……हलचल का रविवारीय विशेषांक…..रचनाकार…समीर लाल 'समीर' जी

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  3. बहुत ही बेहतरीन!

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  4. खूबसूरत कविता।

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  5. sundar prastuti…***punam***bas yun…hi…tumhare liye…

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  6. बहुत बढ़िया गीत….सादर बधाई….

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  7. गूंजे कोयल की कूक सेजंगल में मीठी तानपवन चले मंद मंदगाये दादुर गान ,sundar rachna….

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  8. आपका ब्लॉग भी बहुत ख़ूबसूरत और आकर्षक लगा । अभिव्यक्ति भी मन को छू गई । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद . ।

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  9. कोयल की कूक जैसी ही बहुत मधुर एवं सुन्दर रचना !

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  10. प्रस्तुति अचछी लगी ।मेर पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  11. सुंदर प्रस्‍तुति।

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  12. बहुत सुंदर..

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  13. कल के चर्चा मंच पर, लिंको की है धूम।अपने चिट्ठे के लिए, उपवन में लो घूम।।

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  14. बहुत ही सुंदर , सरल रचना

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  15. बहुत सुन्दर …

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  16. वाह ..बहुत खूब !!

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  17. बहुत ही खूबसूरत कविता। सादर

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