नूतन मनहरण….


नूतन मनहरण किरण से त्रिभुवन को जगा दो
निहारूं तुम्हारे आँखों पर आये अपार करुणा को

नमन है निखिल चितचारिणी धरित्री को जो
नित्य नृत्य करे — नुपुर की ध्वनि को जगा दो

तुम्हे पूजूं हे देव-देवी कृपा दृष्टि रख दो
रागिनी की ध्वनी बजे आकाश नाद से भर दो

इस  मन को निवेदित करूं मै तुम्हारे चरणों पर
प्रेम-रूप से भरी धरनी की पूजा मै कर लूं

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15 responses to this post.

  1. खूबसूरत एवं सराहनीय रचना के लिये बधाई…….कृपया इसे भी पढ़े-नेता कुत्ता और वेश्या

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  2. sunder shabd aur bhav se saji ati sunder kavita.

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  3. शब्द बहुत सुन्दर हैं..kalamdaan.blogspot.in

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  4. गहरे भाव लिए सुंदर रचना।

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  5. बहुत ही खुबसूरत और कोमल भावो की अभिवयक्ति…..

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति!इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!सूचनार्थ!

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  7. बहुत सुंदर भाव संयोजन….http://mhare-anubhav.blogspot.com/ समय मिले कभी तो आयेगा मेरी इस पोस्ट पर आपका स्वागत है

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  8. बेहद ख़ूबसूरत और मनमोहक रचना! प्रशंग्सनीय प्रस्तुती !

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  9. सुन्दर..अति सुन्दर..

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  10. मंत्रमुग्ध कर देनेवाली प्रस्तुति शानदार है |अब पढ़िए दिल की जज्बात यहाँ पधारें http://www.akashsingh307.blogspot.com

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  11. नूतन मनहरण किरण से त्रिभुवन को जगा दोनिहारूं तुम्हारे आँखों पर आये अपार करुणा कोअति मनोहारिणी रचना….प्रेममयी…करुणामयी…..

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  12. वन्दनामय सुन्दर रचना, शब्द बखूबी इस्तेमाल किये है !

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  13. आपकी रचना के शब्द और भाव अप्रतिम हैं…बधाई स्वीकारेंनीरज

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  14. सटीक व सार्थक रचना।

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  15. बहुत सुन्दर सार्थक रचना। धन्यवाद।

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