कश्ती दरिया में




कश्ती दरिया में इतराए ये समझकर

दरिया तो अपनी है इठलाऊं इधर-उधर

किनारा तो है ही अपना ,ठहरने के लिए
दम ले लूंगा मै भटकूँ राह गर

पर उसे मालूम नही ये कमबख्त दरिया तो
किनारों को डुबो देता है सैलाब में

कश्ती को ये बात कौन बताये जालिम
ना दरिया अपनी न किनारा अपना




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9 responses to this post.

  1. कश्ती को ये बात कौन बताये जालिमना दरिया अपनी न किनारा अपना.बहुत सुंदर गज़ल.

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  2. वाह बहुत खूब

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  3. सुंदर भाव…

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  4. बहुत सुन्दर वाह!आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 23-04-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-851 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  5. बढ़िया प्रस्तुति ।बधाई ।।

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  6. bahut gahri baat….achchi lagi.

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  7. Pyari aur chhoti nazm.

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