तन्हाँ सफर



गुज़र गए है दिन इस कदर   तन्हाँ 
साथी न कोई-बस मैं और ये जहां 

हिसाब रखा नहीं उन तन्हाँ पलों का 
तन्हाँ सफ़र को गुज़ारा है तन्हाँ 

सूने कमरे सूनी दीवारों ने सुनी 
मेरी वो दास्ताँ जो मैंने अकेले में बुनी 

एक हसीं हमसफ़र के साथ का  सफरनामा-
सुनाना था ज़िन्दगी को …पर ज़िन्दगी से ठनी 

रब के किस साजिश के तहत मैं तन्हाँ इस कदर 
रिश्तों से महरूम खाया ठोकर दर-बदर 

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12 responses to this post.

  1. तन्हाई के इस सफर को लाजवाब शब्दों में बाँधा है आपने …

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  2. शब्दों की जीवंत भावनाएं… सुन्दर चित्रांकन.बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी.बेह्तरीन अभिव्यक्ति!शुभकामनायें.आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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  3. Udaas rachna hai…Subah jaroor aayegi subah ka intezaar kar…

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  4. sundar abhivyakti..

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  5. खूबसूरत भाव

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  6. रब के किस साजिश के तहत मैं तन्हाँ इस कदर रिश्तों से महरूम खाया ठोकर दर-बदर बहुत बढिया।

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  7. दिल को छू हर एक पंक्ति…

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  8. Pain very beautifully penned!!

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  9. sundar rachna..aabhar

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  10. वाह! अच्छा लिखा है!

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  11. Bahut dard hai aapki kavitha mein 😦Keep Blogging!

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  12. बेहतरीन प्रस्तुति वाह!

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