नाराज़ आँखे



नाराज़ आँखे बोलती रही रातभर 

पर आंच न आया तुम पर –
रहे बेखबर !

सूखे पत्ते सी फडफडाती रही यूं ही 
और गीली आँखों ने चाँद –
सुखाया रातभर !

बुझी हुई आँखों से ज़िन्दगी को देखा इस कदर 
चलती हुई ज़िन्दगी को –
पकडती रही बस  रातभर !

काँटों से ख़्वाबों ने आँखों को खूब चुभोया है 
आंसुओं ने सहलाया है पर  –
उनींदे आँखों को रातभर !

शायद ज़िन्दगी की यही चाल है —पता नहीं 
आंसूं और ख्वाब ने हंगामा –
मचाया है रातभर !
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10 responses to this post.

  1. भावों का सुंदर चित्र…..बधाई

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  2. अहरे भाव लिए … लाजवाब रचना ..

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  3. बहुत ही सुन्दर रचना…:-)

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  4. खुबसूरत अभिवयक्ति……

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  5. kya baat hai nice poem

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  6. सूखे पत्ते सी फडफडाती रही यूं ही और गीली आँखों ने चाँद -सुखाया रातभर !उफ़ मोहब्बत ने क्या क्या रंग दिखाया ज़िन्दगी भर

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  7. bahut behtreen srijan , prvahmay, bhavpoorn .

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  8. जानदार प्रस्तुति

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  9. शायद ज़िन्दगी की यही चाल है —पता नहीं आंसूं और ख्वाब ने हंगामा -मचाया है रातभर,,,बेहतरीन प्रस्तुति ,,,,resent post काव्यान्जलि …: तड़प,,,

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