उत्तराखंड की त्रासदी पर


बादलों की गर्जना से 
     घटाएं उमड़-घुमड़ गयी,
चमन से सेहरे बने 
     धरा को देखती रही  !!

 फुहार जब कहर बना 
     जीवन लीलता गया ,
चंद पलों में हज़ार साँसें 
     सिसकियों में बदल गया  !!

 कहर बन बरस मेघ 
     लाशें निगलता रहा ,
नियति का खेल कैसा!
     शहर उजड़ता रहा !!

तलाश है ज़िन्दगी को 
    साँसों का डोर थाम  ले ,
सूनी-नंगी सड़कों पर फिर 
     कदमों को पहचान ले   !! 

नए पत्तों की आहट अब 
     जाने कब सुनाई दे ,
तारे जड़े आसमां औ’
     चाँद  कब दिखाई दे !!

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10 responses to this post.

  1. बेहतरीन….

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  2. Reblogged this on Bhairawi's Blog and commented:

    उन आँखों की कशिश को महसूस किया था मैंने
    नर्म प्यार का अहसास था मुझे
    जो गीत गुनगुनाया था तुमने
    वो बोल भी भुलाया न गया मुझसे

    Reply

  3. अभी कहाँ छुटकारा -मौसम फिर वैसा ही लग रहा है !

    Reply

  4. याथार्थ पर आधारित

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  5. बेहतरीन अभिवयक्ति…..

    Reply

  6. आपकी यह सुन्दर रचना आज दिनांक 26.07.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

    Reply

  7. दुखद त्रासदी…

    Reply

  8. सुन्दर ,सटीक और सार्थक . बधाईसादर मदन .कभी यहाँ पर भी पधारें .http://saxenamadanmohan.blogspot.in/

    Reply

  9. आज की बुलेटिन जन्म दिवस : मनोज कुमार …. ब्लॉग बुलेटिन में आपकी पोस्ट (रचना) को भी शामिल किया गया। सादर …. आभार।।

    Reply

  10. ापने लिखा… हमने पढ़ा… और भी पढ़ें…इस लिये आपकी इस प्रविष्टी का लिंक 26-07-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल पर भी है…आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाएं तथा इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और नयी पुरानी हलचल को समृद्ध बनाएं…. आपकी एक टिप्पणी हलचल में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान और रचनाकारोम का मनोबल बढ़ाएगी… मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।जय हिंद जय भारत… मन का मंथन… मेरे विचारों कादर्पण…

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