विविधा


ईश्वरीय प्रेम। …।
जग में है सब अपने
मुक्ताकाश , पंछी , सपने
सुगन्धित धरती ,निर्झर झरने
आह्लादित तन मन
प्रेमदान का स्वर्गीय आनंद।।

प्रकृति चित्रण। ………
धरा,सरिता,औ’ नील गगन
प्रस्फुटित पुष्प,वसंत आवागमन,
दारुण ग्रीष्म,शीत,और हेमंत
खग कलरव – गुंजायमान दिक्-दिगंत,
प्रकृति से परिपूर्णता का आनंद।।

प्रेम की विसंगतियां …….
जनमानस से परिपूर्ण इस जग में
एकाकीत्व का आभास रग – रग में
रहता है ये  आतुर मन प्रतीक्षारत
एकाकीत्व लगे अपना सा ।


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9 responses to this post.

  1. बहुत सुंदर ..

    Reply

  2. शिवरात्रि के पावनपर्व पर हार्दिक शुभकामनायें…!
    बहुत खूब,सुंदर रचना…!

    RECENT POST – फागुन की शाम.

    Reply

  3. अच्छी कविता , शब्दों का चयन भी अच्छा , भाव प्रवण भी

    Reply

  4. शिवरात्रि के पावन अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें

    Reply

  5. बहुत सुंदर …..

    Reply

  6. बहुत खूब

    Reply

  7. महाशिवरात्रि की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें |
    New post तुम कौन हो ?
    new post उम्मीदवार का चयन

    Reply

  8. महाशिवरात्रि की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें | आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी इस विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन – महादेव के अंश चंद्रशेखर आज़ाद पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

    Reply

  9. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (28.02.2014) को ” शिवरात्रि दोहावली ( चर्चा -1537 )” पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें, वहाँ आपका स्वागत है। महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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