फागुन का रंग





पाखी उड़ जा रे 
बहती हवा में महकी फ़िज़ा में, 
कल-कल बहती सरित-झरनों में, 
शीत का अंत है ये !!!

पीले हरे फूलों के रंग- 

पलाश-ढाक के पत्तों के संग,
भ्रमर गुंजायमान,वसंत के ढंग,
फागुन का रंग है ये !!!!

प्रेम-प्लावित ह्रदय अनुराग; 

आह्लादित मन  गाये विहाग; 
ऋतुराज ने छेड़ा वसंत राग- 
फागुन का दंश है ये !!!!

तारों भरा गगन रजनीकर-

तारक-दल-दीपों से उज्जवल, 
नभ पर जगमग जलता प्रतिपल 
फागुन का गगन है ये !!!

पाखी तेरा नीड़  सघन;  

डाली-डाली शाखा उपवन; 
सुखी तेरा संसार निज-जन- 
फागुन का बयार है ये !!!



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5 responses to this post.

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

    Reply

  2. खूबसूरत पंक्तियाँ…

    Reply

  3. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति…!
    RECENT POST – माँ, ( 200 वीं पोस्ट, )

    Reply

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