लम्हों में जीती रही….













पत्तों के हिलने मे तेरे आने की आहट सुनूँ 

तुम मेरे शहर मे आये तुमसे मिलने का ख्वाब बुनूं ||

शाम ढलने लगी  चिरागों से बात करने लगी 
तुम्हारे आने की इंतज़ार मे लम्हा-लम्हा पिघलती रही  ||

वफ़ा-ए -इश्क़ की कौन सी तस्वीर है ये 
तेरे पाँव के निशाँ  मे ही अपना वज़ूद ढूंढ़ती रही ||

मेरी सिसकियाँ शायद तुम तक न पहुँच पाया अभी
लम्हा कतरा-कतरा पिघलता रहा मै लम्हों में जीती रही ||





चित्र  गूगल साभार 

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