माथे की लकीरों में


माथे की लकीरों में बसा है 
तज़ुर्बा – ए -ज़िन्दग़ी 
यूं ही नहीं बने हैं 
ज़ुल्फ़-ए-सादगी ॥ 

ख़्वाहिशों से भरा घर 
मुक़म्मल हो नहीं सकता 
बहुत सी ठोकरें खाकर 
सम्भला है ज़िन्दगी ॥ 

अरमान अपने भुलाकर ही 
पाया है अपनों का प्यार 
हसरतें अपनी छुपाकर ही 
मिली है खुशियां हज़ार ॥ 

हम बे मुरव्वत मुरादबीं 
अपने इरादों को मसलकर 
अपनों में बसे अपनों की 
अपनीयत ढूंढते है ॥ 


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