Archive for the ‘कविता’ Category

माथे की लकीरों में


माथे की लकीरों में बसा है 
तज़ुर्बा – ए -ज़िन्दग़ी 
यूं ही नहीं बने हैं 
ज़ुल्फ़-ए-सादगी ॥ 

ख़्वाहिशों से भरा घर 
मुक़म्मल हो नहीं सकता 
बहुत सी ठोकरें खाकर 
सम्भला है ज़िन्दगी ॥ 

अरमान अपने भुलाकर ही 
पाया है अपनों का प्यार 
हसरतें अपनी छुपाकर ही 
मिली है खुशियां हज़ार ॥ 

हम बे मुरव्वत मुरादबीं 
अपने इरादों को मसलकर 
अपनों में बसे अपनों की 
अपनीयत ढूंढते है ॥ 


वो दिन बारिश के…..












याद है वो दिन बारिश के ?
जब भी निकले- छाते को बंद कर  –
लटकाए से घूमा करते थे –


भींगना था पर पानी में ही नही ,
तुम्हारे साथ बीते हुए पलों के
 बौछारों में –

सनसनाती हवाएं , सोंधी सी 
मिटटी की खुशबू , बताये देती थी ,
मौसम भींगा है –

बहुत देर तक – चुपचाप-जाते हुए 
लम्हों को देखा करते थे – कोशिश थी –
पकड़ने की-

वक्त अपने वक्त के हिसाब से –
वक्त दिखाकर चला गया-हम लम्हों –
को ढूँढ़ते रह गए –

रास्ते अब भी वहीं है –
बारिश के दिनों में भींगती हुई –      
बस दो हाथ अलग हुए ॥ 

छुईमुई सी लम्हें ….










छुईमुई सी लम्हें 
खुश्बू से भरी वो यादें 
तेरे आने की आहट 
वो झूठ मूठ के वादे 

छुप-छुपके पीछे आना 
हाथों से आँखें ढकना 
पकडे जाने के डर  से 
दीवारों में छुप जाना 

तेरे खातिर जो दिल ये 
डोल -डोल फिरता था 
तुझसे ही जाने क्यों ये 
मुझको छिपाए फिरता था 

वो आँखें ढूंढती सी 
जो मुझपे ही फ़िदा थी 
पर तुम न जान पायी 
मुझे जान  से वो प्यारी थी 

धीरे से सामने आना 
आकर सीने से लिपटना 
लम्हों से गुज़ारिश थी ये 
धीरे धीरे सरकना 

यादों के बज़्म से ये
 कुछ चित्र बनाया मैंने 
पर लम्हों की फितरत है 
उसे छू न सका किसी ने 

कैसे समझाऊँ दिल को 
लहूलुहान है ये 
वो  अतीत के पल जो 
सूई चुभो जाती है 

रंग….फीका सा










हंसती हुई आँखों में जो प्यार का पहरा रहता है-
असल में उन आँखों के ज़ख्म गहरे होते है ||

जलती हुई लौ भी जो उजारा करे मजारों को-
सुना है उन मजारों को बड़ी तकलीफ होती है ||

दिल जो किसी के प्यार का जूनून लिए चलता है-
उन्हीं दिलों में धोखों के अफ़साने छुपे रहते है ||

रात जो लेकर आती है चांदनी की बौछारें –
उन्हीं रातों में अमावस की रात भी शामिल होती है ||

हवाओं में बहती हुई दिखते है जो प्यार के रंग-
उन्हीं रंगों में एक रंग फीका सा भी होता है ||

सौ साल बाद……..


सौ साल पहले भी मैंने तुम पर कविता रचा था
सौ साल बाद आज तुम पढ़ने आई II
आँखों की भाषा जो मैंने उस समय पढ़ लिया था
सौ साल बाद आज तुम कहने आई II

जिन आँखों को आंसुओं से  धोया था हमने
उस वक़्त को इशारों से रोका था जो हमने
धूप छाँव सी ज़िन्दगी में अब बचा ही क्या है ?
सौ साल बाद आज तुम रंग भरने आई II

सांस  लेने की आदत थी….. लेता रहा तक
सदियों से बरसों से आदतन जीता रहा अब तक
ख़ामोशी को बड़ी ही ख़ामोशी से आज जब गले लगाया
सौ साल बाद आज वो रिश्ता तुम आजमाने आई II

रेत से घर नहीं बनता……….



रेत  से घर नहीं बनता 
पानी में ख्वाव नहीं बहते 
मन के अन्तर्निहित गहराई 
किसी पैमाने से नहीं नपते 

नए कोपलों में दिखता है 
पौधों की हरियाली की चाहत 
फूलों से भरी है गुलशन पर 
कलिओं को खिलने से नहीं राहत 

देह के नियम है अजीब 
थकता नहीं है सांस लेने में 
नींद में बुनते है ख्वाब सारे 
उम्मीदें टूटती है खुले आँखों से 

चराचर प्रकृति का नियम यही 
विरोधाभास सृष्टि का चलन है 
जो प्रवाह करे शिला खंड-खंड 
वो प्रवाहिनी नीर जीवन है 

समय के काल-खंड में 
जाने कौन सा रहस्य है छुपा 
कितने ही रंगों और ऋतुओं से 
धरित्री तुम हो अपरूपा 


नया अध्याय तू पढ़




सांस जब तक चल रही है 
तुम भी  ज़िंदा हो पथिक
तुम अकेले ही नहीं हो –
चॉंद  तारे भी सहित

पाँव के नीचे जो धरती है 
वो राह दिखलाये
मोह माया त्याग दे 
कहीं ये न तुझे भरमाये

दंश भूखे पेट की 
तुझको समझना है अभी
बेघरों का आशियाना 
तुझको बनना है अभी

शून्य में ही भ्रमण करना 
नहीं है नियति तेरा
काल-कवलित सूव्यवस्था-
जीवंत करना है अभी

दिशाहीन तुम यूँ न भटको 
करो चुनौती स्वीकार
हिम्मत करो ऐ राहगीर 
लहरों से डरना है बेकार

मोतियों को सीपियों से 
ढूंढ लाना है कठिन
पर ये मोतियाँ क्या मिलता –
है नहीं बाज़ार मे

प्रबल झञ्झावात का भी 
सामना करते है खग
नीड़ पुनः निर्माण हेतु 
ढूँढ ही लेते तृण-पत्र

हिला दे सागर की गहराई 
वो हिम्मत तुम मे है
हुंकार गूँजे दस दिशाओं में 
वो गर्जन तुम में है

बेसहारों का सहारा 
बन ही जाओ रे पथिक
लक्ष्य को पाना सरल गर 
ठान लो मन मे तनिक

कर्म करना है निरंतर 
फल की चिंता है कहाँ
अनचाहा या मनचाहा 
परिणाम डरना है कहाँ

बंधन अनैतिकता का तोड़ 
चिंतन-मनन से नाता जोड़
अतीत के विष को वमन कर 
नया अध्याय तू पढ़