Archive for the ‘गुरुदेव की रचना से प्रेरित’ Category

आज भारत है लज्जित…..


महान कविगुरु रविन्द्र नाथ ठाकुर द्वारा रचित ये  कविता कितना  सटीक प्रतीत होता  है ……….
 

 आज भारत  है लज्जित
हीनता से सुसज्जित 
न  वो पौरुष न विचार 
न वो तप न सदाचार 
अंतर -बाह्य ,धर्मं -कर्म
सभी ब्रह्म विवर्जित 

हे रूद्र !!!!
धिक्कृत लांछित इस पृथ्वी पर 
सहसा करो बज्राघात 
हो जाये सब धूलिसात 
पर्वत-प्रांतर- नगर-गाँव 
जागे लेकर आपका नाम 
पुण्य-वीर्य-अभय-अमृत से 
धरा पल में हो सुसज्जित ॥ 

আজি এ ভারত লজ্জিত হে,
হীনতাপঙ্কে মজ্জিত হে
নাহি পৌরুষ, নাহি বিচারণা, কঠিন তপস্যা, সত্যসাধনা-
অন্তরে বাহিরে ধর্মে কর্মে সকলই ব্রহ্মবিবর্জিত হে ।।
ধিককৃত লাঞ্ছিত পৃথ্বী’পরে, ধূলিবিলুন্ঠিত সুপ্তিভরে-
রুদ্র, তোমার নিদারুণ বজ্রে করো তারে সহসা তর্জিত হে ।
পর্বতে প্রান্তরে নগরে গ্রামে জাগ্রত ভারত ব্রহ্মের নামে,
পুণ্যে বীর্যে অভয়ে অমৃতে হইবে পলকে সজ্জিত হে ।। 

 
 

पिंजरे की चिड़िया


पिंजरे की चिड़िया थी           सोने के पिंजरे में
                 वन कि चिड़िया थी वन में
एकदिन हुआ                 दोनों का सामना
             क्या था विधाता के मन में

वन की चिड़िया कहे    सुन पंजरे की चिड़िया रे
         वन में उड़े दोनों मिलकर
पिंजरे की चिड़िया कहे        वन की चिड़िया रे
            पिंजरे में रहना बड़ा सुखकर

वन की चिड़िया कहे ना ……
   मैं पिंजरे में कैद रहूँ क्योंकर
पिंजरे की चिड़िया कहे हाय
     निकलूँ मैं कैसे पिंजरा तोड़कर

वन की चिड़िया गाये    पिंजरे के बाहर बैठे
          वन के मनोहर गीत
पिंजरे की चिड़िया गाये     रटाये हुए जितने
         दोहा और कविता के रीत

वन की चिड़िया कहे    पिंजरे की चिड़िया से
       गाओ तुम भी वनगीत
पिंजरे की चिड़िया कहे    सुन वन की चिड़िया रे
        कुछ दोहे तुम भी लो सीख

वन की चिड़िया कहे ना ………..
     तेरे सिखाये गीत मैं ना गाऊं
पिंजरे की चिड़िया कहे हाय!
     मैं कैसे वनगीत गाऊं

वन की चिड़िया कहे    नभ का रंग है नीला
      उड़ने में कहीं नहीं है बाधा
पिंजरे की चिड़िया कहे    पिंजरा है सुरक्षित
      रहना है सुखकर ज्यादा

वन की चिड़िया कहे   अपने को खोल दो
      बादल के बीच, फिर देखो
पिंजरे की चिड़िया कहे   अपने को बांधकर
     कोने में बैठो, फिर देखो

वन की चिड़िया कहे ना…….
     ऐसे में उड़ पाऊँ ना रे
पिंजरे की चिड़िया कहे हाय
     बैठूं बादल में मैं कहाँ रे

ऐसे ही दोनों पाखी    बातें करे रे मन की
     पास फिर भी ना आ पाए रे
पिंजरे के अन्दर से     स्पर्श  करे रे मुख से
         नीरव आँखे सबकुछ कहे रे

दोनों ही एक दूजे को     समझ ना पाए रे
        ना खुद को  समझा पाए रे
दोनों अकेले ही       पंख फड़फड़आये
        कातर कहे पास आओ रे 

वन की चिड़िया कहे ना…………
      पिंजरे का द्वार हो जाएगा रुद्ध 
पिंजरे की चिड़िया कहे हाय 
   मुझमे शक्ति नही है उडूं खुद
गुरुदेव रविन्द्र नाथ ठाकुर द्वारा रचित काव्य का काव्यानुवाद 

भ्रमर कहे………………


 red roses गुलाब का फूल खिला है इधर 
मधुप मत जाओ रे 
फूलों से शहद लेते हुए कहीं 
तुम  काँटों से आहत न हो रे 


इधर है बेला उधर है चम्पा 
विविध फूल है सर्वत्र 
व्यथा कथा अपने मन की 
कह दो ये यहाँ है एकत्र 


भ्रमर कहे मै ये जानूं 
इधर बेला है उधर नलिनी 
पर मैं न जाऊं इधर – उधर 
ये नहीं है मेरी संगिनी 


मैं तो अपनी व्यथा-कथा 
बांचुंगा गुलाब के संग 
गर मैं आहत होऊं तो क्या 
सह लूंगा मै काँटों का दंश 

विस्मय से जागृत हुआ ये प्राण


सूर्य-तारा से भरा हुआ असमान
ये विश्व जिसमे भरा है प्राण
इन सबके साथ मैंने भी पाया है अपना स्थान
आश्चर्य से पुलकित हो गया प्राण

इस सीमाहीन प्राणों के तरंगों पर
भुवन झूमता है जिस ज्वार-भाटा पर
रगों में बह रही रक्त धारा में
प्रतीत होता है अपनापन

वन के राह पर जाते हुए
जिन घासों पर कदम रखा
फूलों के खुशबुओं से चमक उठा मन
मन हुआ है मतवारा
फैला चारों ओर आनंद-गान
विस्मय से जागृत हुआ ये प्राण

आँख और कान को धरती पर बिछाया
धरती के सीने में अपने प्राण को उडेला
“जाना ” से “अनजाना” का संधान मिला
विस्मय से जागृत हुआ ये प्राण

विस्मय से जागृत हुआ ये प्राण


सूर्य-तारा से भरा हुआ असमान
ये विश्व जिसमे भरा है प्राण
इन सबके साथ मैंने भी पाया है अपना स्थान
आश्चर्य से पुलकित हो गया प्राण
इस सीमाहीन प्राणों के तरंगों पर
भुवन झूमता है जिस ज्वार-भाटा पर
रगों में बह रही रक्त धारा में
प्रतीत होता है अपनापन
वन के राह पर जाते हुए
जिन घासों पर कदम रखा
फूलों के खुशबुओं से चमक उठा मन 
मन हुआ है मतवारा
फैला चारों ओर आनंद-गान
विस्मय से जागृत हुआ ये प्राण
आँख और कान को धरती पर बिछाया
धरती के सीने में अपने प्राण को उडेला
“जाना ” से “अनजाना” का संधान मिला
विस्मय से जागृत हुआ ये प्राण

निविड़ घन अँधेरे में…………….


निविड़ घन अँधेरे में जल रहा है ध्रुवतारा 
रे मेरे मन इन पत्थरों में  न होना दिशाहारा 
विषादों में डूबकर गुनगुनाना बंद मत कर 
अपने जीवन को सफल कर ले तोड़कर मोहकारा 
रखना बल जीवन में चिर-आशा हृदय में 
शोभायमान इस धरती पर बहे प्यार कि धारा 
संसार के इस सुख-दुःख में चलते रहना हँसते हुए 
हृदय में सदा भर के रखना उनका सुधा धारा

निविड़ घन अँधेरे में………….


निविड़ घना अँधेरे में जल रहा है ध्रुवतारा
रे मेरे मन इन पत्थरों में  न होना दिशाहारा
विषादों में डूबकर गुनगुनाना बंद मत कर
अपने जीवन को सफल कर ले तोड़कर मोहकारा
रखना बल जीवन में चिर-आशा हृदय में
शोभायमान इस धरती पर बहे प्यार कि धारा
संसार के इस सुख-दुःख में चलते रहना हँसते हुए
हृदय में सदा भर के रखना उनका सुधा धारा