Archive for the ‘तन्हाई’ Category

पिघलते क़तरों में……….


पिघलते क़तरों में जो लम्हा है जीया
उन लम्हों की क़सम मैंने ज़हर है पीया –

कोई वादा नहीं था इक़रार-ए-बयाँ  का
कानों से उतर के वो दिल में बसा था ॥

अश्क़ों से लबालब ये वीरान सी आँखें
ग़म की ख़ुमारी और बोझल सी रातें –

दीदार-ए-यार कभी सुकूँ-ए-दिल था
देके दर्दे इश्क़ तेरे साथ ही चला था ॥

नालिश जो थी तेरे लिए तेरे ही खातिर
बयाँ न हो पाया वो अहसास गुज़र गया –

दरों दीवार जो दो दिलों का था आशियाना
मजार-ए-इश्क़ आज वहीँ पे दफ़न है  ॥ 

वो दिन बारिश के…..












याद है वो दिन बारिश के ?
जब भी निकले- छाते को बंद कर  –
लटकाए से घूमा करते थे –


भींगना था पर पानी में ही नही ,
तुम्हारे साथ बीते हुए पलों के
 बौछारों में –

सनसनाती हवाएं , सोंधी सी 
मिटटी की खुशबू , बताये देती थी ,
मौसम भींगा है –

बहुत देर तक – चुपचाप-जाते हुए 
लम्हों को देखा करते थे – कोशिश थी –
पकड़ने की-

वक्त अपने वक्त के हिसाब से –
वक्त दिखाकर चला गया-हम लम्हों –
को ढूँढ़ते रह गए –

रास्ते अब भी वहीं है –
बारिश के दिनों में भींगती हुई –      
बस दो हाथ अलग हुए ॥ 

लम्हों में जीती रही….













पत्तों के हिलने मे तेरे आने की आहट सुनूँ 

तुम मेरे शहर मे आये तुमसे मिलने का ख्वाब बुनूं ||

शाम ढलने लगी  चिरागों से बात करने लगी 
तुम्हारे आने की इंतज़ार मे लम्हा-लम्हा पिघलती रही  ||

वफ़ा-ए -इश्क़ की कौन सी तस्वीर है ये 
तेरे पाँव के निशाँ  मे ही अपना वज़ूद ढूंढ़ती रही ||

मेरी सिसकियाँ शायद तुम तक न पहुँच पाया अभी
लम्हा कतरा-कतरा पिघलता रहा मै लम्हों में जीती रही ||





चित्र  गूगल साभार 

मन कोयला…..


मन कोयला बन जल राख  हुई 
धूआं उठा जब इस दिल  से 
 तेरा ही नाम लिखा फिर भी 
              हवा ने , बड़े जतन से 


        तेरी याद मन के कोने से 
        रह-रह कर दिल को भर जाए 
        जिन आँखों में बसते थे तुम 
              उन आँखों को रुला जाए 


जाने क्यों दिल की बस्ती में 
है आग लगी ,दिल जाने ना,
अंतस पीड़ा की ज्वाला भी 
जलता जाए बुझ पाए ना 

            नितांत अकेला सा ये दिल 
            शब्दों से भी छला जाए
             टूट कर बिखरे पल ये 
             हाथों से क्यों छूटा जाए ?

सौगात -ए – ग़म न माँगा था 
इश्क़-ए -दुनिया के दामन से 
जो भी मिला  सर आँखों पर 
कुछ इस मन से कुछ उस मन से 
             

अमावस में बिखेरूँगी…….


painting by sh raja ravi verma

चुप हूँ मैं.…पर उदास नहीं 
सपने ओझल हुए पर बुझे नहीं 
है  अनोखी सी ये ज़िन्दगी 
और ये गुज़रते वक़्त का साथ  ॥ 

दिन-दोपहर-रात….. एक सा !
आँखों में फैला एक धूआं सा ,
छांव की तलाश में है आँखें उनींदी ,
जाने कोई पकड़ ले वक़्त का हाथ    !!

शहद सी मीठी जीवन की आस ,
पर लम्हों से जुड़े है वक़्त की शाख़ ,
काल-दरिया में बहना न चाहूँ मैं ,
इश्क़ का मोहरा ग़र दे दे साथ   ॥ 

एकाकी जीवन रोशन कर ली मैंने ,
सूरज को आँचल में छुपाया है मैंने ,
चांदनी की छटा भी समेट लिया है ,
अमावस में बिखेरूँगी जगमगाता प्यार !!

तनहा ज़िन्दगी





तनहा  ज़िन्दगी में गुजर बसर करते है 
काफिले के साथ भी तनहा-तनहा चलते है 


दिन में भीड़ करती है मुझे परेशान 
रात को तन्हाई में भी सोया नहीं करते है 


परछाईं को देख मैं हूँ इस कदर हैरां
गुजरी उम्र …हम अकेले चला करते है 


रात का सन्नाटा आवाज़ देती है मुझे 
जाऊं कैसे हम तो तन्हाई में डूबे रहते है