Archive for the ‘नज़्म’ Category

पिघलते क़तरों में……….


पिघलते क़तरों में जो लम्हा है जीया
उन लम्हों की क़सम मैंने ज़हर है पीया –

कोई वादा नहीं था इक़रार-ए-बयाँ  का
कानों से उतर के वो दिल में बसा था ॥

अश्क़ों से लबालब ये वीरान सी आँखें
ग़म की ख़ुमारी और बोझल सी रातें –

दीदार-ए-यार कभी सुकूँ-ए-दिल था
देके दर्दे इश्क़ तेरे साथ ही चला था ॥

नालिश जो थी तेरे लिए तेरे ही खातिर
बयाँ न हो पाया वो अहसास गुज़र गया –

दरों दीवार जो दो दिलों का था आशियाना
मजार-ए-इश्क़ आज वहीँ पे दफ़न है  ॥ 

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इस blog का  Total pageview  एक लाख के ऊपर पहुंच गया है।   इस    ब्लॉग के सभी पाठकों को अजस्र  धन्यवाद। आशा है आगे भी आप सब का आशीर्वाद यूं ही प्राप्त करती रहूँगी। मेरे पुराने पोस्ट से  एक रचना पेश है। 
(1)
चाँद खिला पर रौशनी नही आयी
रात बीती पर दिन न चढ़ा
अर्श से फर्श तक के सफ़र में
कमबख्त रौशनी तबाह हो गयी। 
(2)
दिल की हालत कुछ यूं बयान हुई
कुछ इधर गिरा कुछ उधर गिरा
राह-ए-उल्फत का ये नजराना है जालिम
न वो तुझे मिला न वो मुझे मिला  ।

अकेले चले थे…..











अकेले चले थे , तन्हां सफ़र था

मुसाफिर मिले जो… राहें जुदा थी 
लम्बी सी सड़कें और दिन पिघले-पिघले 
तन्हाई के जाने ये आलम कौन सी ?

पेड़ों के  कतारों की बीच की पगडण्डी 
कब से न जाने खड़ी है अकेली 
सुनसान राहें… न क़दमों की आहट 
इंतजार है उसको भी न जाने किसकी !!

बस सूखे पत्तों की गिरने की आहट 
बारिश की टप-टप चिड़ियों की चहचहाहट 
दाखिल हो जाता हूँ अक्सर इस सफ़र में 
है झींगुर के शोर औ पत्तों की सरसराहट !!

कब तक मैं समझाऊँ  इस तन्हां  दिल को
नज्मों से बहलाए – फुसलाये पल को
तन्हाई का साथ छुडाना जो चाहूँ
भीड़ अजनबियों का नहीं भाता है मन को !!

गर कोई बिखरी सी नज़्म मिल जाए
कतरन-ए -ख्वाव पर पैर पड़ जाए
बज़्म-ए-याद से कुछ यादें  दरक जाए
तनहा जीने का फिर सबब मिल जाए  !!

नाराज़ आँखे



नाराज़ आँखे बोलती रही रातभर 

पर आंच न आया तुम पर –
रहे बेखबर !

सूखे पत्ते सी फडफडाती रही यूं ही 
और गीली आँखों ने चाँद –
सुखाया रातभर !

बुझी हुई आँखों से ज़िन्दगी को देखा इस कदर 
चलती हुई ज़िन्दगी को –
पकडती रही बस  रातभर !

काँटों से ख़्वाबों ने आँखों को खूब चुभोया है 
आंसुओं ने सहलाया है पर  –
उनींदे आँखों को रातभर !

शायद ज़िन्दगी की यही चाल है —पता नहीं 
आंसूं और ख्वाब ने हंगामा –
मचाया है रातभर !

ये धूप की बेला





ये धूप की बेला 
ये छांव सी ज़िन्दगी 
न चांदनी रात 
न सितारों से दिल्लगी 


जमी हूँ मै शिला पर –
बर्फ की तरह 
काटना है मुश्किल 
ये पहाड़ सी ज़िन्दगी 


थम जाती है साँसें
पलकें हो जाती है भारी
भरकर तेरी आहें 
आंसूं बहे है खारी


अनजाने अजनबी तुम 
 जीवन में यूं आये

हसीं ख्वाब मेरे 
तुमने यूं चुराए 

मन की चोर निगाहें 
ढूंढें परछाईं मेरी 
हवाओं की सरसराहट 
पैगाम लाती थी तेरी 

वो भूला सा शख्स 
ये यादों का बज़्म 
तेरी याद में लिख दिया 
ये दर्द भरा नज़्म 




पेड़ के ….


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पेड़ के पीछे से
झरनों के नीचे से
नदियों के किनारे से
बागियों के दामन से
पहाड़ों की ऊँचाई से
नाम तेरा पुकारूं


पेड़ो से टकराकर
झरनों से लिपटकर
नदियों से बलखाकर
बागियों को महकाकर
पहाडो की वादियों से
नाम तेरा गूंजे
तुझे कई बार सुनाई दे


वक़्त गुज़रा हुआ


तू है वक़्त गुज़रा हुआ 
मुरझाया फूल किताबों में रखा 
तुझे न याद करूँ एक पल से ज्यादा 
कि दिल में तू नहीं अब कोई और है 


तुम से खिला करती थी जो बगिया 
इंतज़ार में पल गिनता था ये छलिया 
अब उन लम्हों में खुशबू बिखेरा जिसने 
वो अब तुम नहीं कोई और है 


ख़्वाबों में, नींदों में, ख्यालों में नहीं तुम 
राह पर, मोड़ पर , धडकन में नहीं तुम 
अब रात गुज़रती है जिनके अरमान लिए 
वो अरमान नहीं तुम ..कोई और है 


वो जो है मेरी आज की ख्वाहिश 
उसका सदका उतार दूं न रहे खलिश 
बिछड़ने का डंक डसा था जिसने 
वो कोई और नहीं वो तू ही है