Archive for the ‘प्रकृति’ Category

बिंब



झरनों सा गीत गाता ये मन 

सरिता की कलकल मधुगान 
सृष्टि है…. अनादि-अनंत 
भावनाओं से भरा है ये प्राण 

वरदान है कण-कण में छुपा 
दुःख-वेदना से जग है भरा 
पर स्वर्ण जीवन से भरा है 
नदी-सागर और ये धरा 

गूंजता स्वर नील-नभ में 
मोरनी … नाचे वन  में 
गा  रहा है गीत ये मन 
देख प्रकृति की ये छटा 

सोंधी महक में है एक नशा 
चन्द्रमा का प्रेम है निशा 
स्वप्नमय है ये वसुंधरा 
दिन उजला रात है घना 

देख श्याम घन गगन में 
ह्रदय-स्पंदन…. बढे रे 
नृत्य करे मन मत्त क्षण में 
सुप्त नाड़ी भी जगे रे 

कल-कल सरित गुंजायमान 
नद नदी सागर प्रवाहमान 
पुष्प सज्जित है उपवन 
और धरित्री चलायमान  



विविधा


ईश्वरीय प्रेम। …।
जग में है सब अपने
मुक्ताकाश , पंछी , सपने
सुगन्धित धरती ,निर्झर झरने
आह्लादित तन मन
प्रेमदान का स्वर्गीय आनंद।।

प्रकृति चित्रण। ………
धरा,सरिता,औ’ नील गगन
प्रस्फुटित पुष्प,वसंत आवागमन,
दारुण ग्रीष्म,शीत,और हेमंत
खग कलरव – गुंजायमान दिक्-दिगंत,
प्रकृति से परिपूर्णता का आनंद।।

प्रेम की विसंगतियां …….
जनमानस से परिपूर्ण इस जग में
एकाकीत्व का आभास रग – रग में
रहता है ये  आतुर मन प्रतीक्षारत
एकाकीत्व लगे अपना सा ।


शाश्वत और साकार ………


Art Image



एक मुट्ठी धूप पसरा है छत पर
सोचती हूँ बादल का कोइ टुकड़ा ;
गर ढक ले इस सुनहरे धूप को,
तो क्या आँच आएगी इस आँच को !!

आभास हुआ ……
बादल तो नटखट है
उड़ जाएगा हवा के साथ
अटखेलियां  करता हुआ
पर धूप से बादल की मित्रता तो क्षणिक है,,
वायु  और घन का साथ प्रामाणिक है ;
अस्तित्व धूप का निर्विकार है,
जीवन रस सा शाश्वत और साकार है

धूप का आवागमन निर्बाध है
ग्रहण से क्षणिक साक्षात्कार है,
बस यूँ ही सृष्टि का चलाचल है
धूप, बादल, ग्रहण इसी का फलाफल है ।।

  

प्रकृति


जो घूमती है ये धरा
तो है दिन रात का माजरा 
है चाँद की सोलह कला
है सूर्य से रोशन धरा 
शीतल जो ये बहे बयार 
गुंजरित है ये बहार 
कलियाँ जो है अधखिली 
प्रस्फुटित करे बयार 
शीत ऋतू तो है दबंग 
काँप जाए अंग अंग 
सूर्य और चन्द्रमा भी 
ताप ला न पाए संग 
ग्रीष्म भी है चंचला 
लू चलाये मनचला
उत्ताप-ताप से भरा है 
तप्त दिन औ रात गला 
वृष्टि भी तो है अजब 
हो अमीर या गरीब 
स्नेह-धार से भिगोये 
चल न पाए तरकीब 
दिन-रात ये मौसम 
चले ये साथ,औ हम 
भी साथ-साथ चले 
अद्भुत प्रकृति-मानव संगम