Archive for the ‘प्रेम’ Category

माथे की लकीरों में


माथे की लकीरों में बसा है 
तज़ुर्बा – ए -ज़िन्दग़ी 
यूं ही नहीं बने हैं 
ज़ुल्फ़-ए-सादगी ॥ 

ख़्वाहिशों से भरा घर 
मुक़म्मल हो नहीं सकता 
बहुत सी ठोकरें खाकर 
सम्भला है ज़िन्दगी ॥ 

अरमान अपने भुलाकर ही 
पाया है अपनों का प्यार 
हसरतें अपनी छुपाकर ही 
मिली है खुशियां हज़ार ॥ 

हम बे मुरव्वत मुरादबीं 
अपने इरादों को मसलकर 
अपनों में बसे अपनों की 
अपनीयत ढूंढते है ॥ 


छुईमुई सी लम्हें ….










छुईमुई सी लम्हें 
खुश्बू से भरी वो यादें 
तेरे आने की आहट 
वो झूठ मूठ के वादे 

छुप-छुपके पीछे आना 
हाथों से आँखें ढकना 
पकडे जाने के डर  से 
दीवारों में छुप जाना 

तेरे खातिर जो दिल ये 
डोल -डोल फिरता था 
तुझसे ही जाने क्यों ये 
मुझको छिपाए फिरता था 

वो आँखें ढूंढती सी 
जो मुझपे ही फ़िदा थी 
पर तुम न जान पायी 
मुझे जान  से वो प्यारी थी 

धीरे से सामने आना 
आकर सीने से लिपटना 
लम्हों से गुज़ारिश थी ये 
धीरे धीरे सरकना 

यादों के बज़्म से ये
 कुछ चित्र बनाया मैंने 
पर लम्हों की फितरत है 
उसे छू न सका किसी ने 

कैसे समझाऊँ दिल को 
लहूलुहान है ये 
वो  अतीत के पल जो 
सूई चुभो जाती है 

इशकनामा






जिस्मों से परे दो रूहों को-
मिलाता है इश्क़ 
जीते है साथ और जीने की ख़ुशी –
दिलाता है इश्क़ 

प्रेम दरिया में डूबकर भी प्यासा 

रह जाता है इश्क़ 
समंदर सी गहराई औ नदी सा-
मीठा पानी है इश्क़ 

बादल गरजे तो बूँद बन जिस्म 

भिगोती है इश्क़ 
प्रेम-ज्वार परवान तो चढ़े पर भाटा
 न आने दे इश्क़ 

अनहद-नाद-साज़ प्रेम-गह्वर से 

प्रतिध्वनित है इश्क़ 
मंदिरों में घंटी सी बजे और मस्जिदों में
 अजान है इश्क़ 

इश्क़ इंसान से हो या वतन से मिटने को 

तैयार रहता  है इश्क़ 
ख़ुश्बुओं से ग़र पहचान होती गुलाब की 
शोख रवानी है इश्क़ 

ख्यालों में सवालों में…..जवाब ढूंढ

 लाती है इश्क़ 
  आसमान रंग बदले चाहे पड़ता नहीं 
फीका रंग-ए-इश्क़ 

सिमट जायेगी ये दुनिया गर मिट जाए 

नामों निशां-ए-इश्क़ 
बीज जो पनपते ही रंग दे दुनिया वो
 खूबसूरत तस्वीर है इश्क़