Archive for the ‘anuvad’ Category

नदी में ज्वार…..


नदी में ज्वार आया
पर तुम आये कहाँ
खिडकी दरवाजा खुला है
पर तुम दिखे कहाँ
पेड़ों की डालियों पर
मुझे देख कोयल कूके
पर आज भी तुम दिखे नही
आखिर तुम हो कहाँ
सजी-धजी मंदिर जाऊं
पूजा करूँ सजदा करूँ
कभी तो पसीजोगे तुम
गर दिख जाओ मुझे यहाँ
लोग मुझे देख हँसे
दीवानी लोग मुझे कहे
अश्रु के सैलाब से
भर गया ये जहां



नजरुल कविता से अनुदित 

मर जाउंगी सूख-सूख कर ( गुरुदेव की रचना से प्रेरित,)


हृदय मेरा कोमल अति सहा न पाए भानु ज्योति
प्रकाश यदि स्पर्श करे मरे हाय शर्म से
भ्रमर भी यदि पास आये भयातुर आँखे बंद हो जाए
भूमिसात हम हो जाए व्याकुल हुए शर्म से
कोमल तन को पवन जो छुए तन से फिर पपड़ी सा निकले
पत्तों के बीच तन को ढककर खड़े है छुप – छुप के
अँधेरा इस वन में ये रूप की हंसी उडेलूंगी मै  सुरभि राशि 
इस अँधेरे वन के अंक में मर जाउंगी सूख-सूख कर

श्री सुकुमार राय द्वारा रचित काव्य का काव्यानुवाद


कागज़ कलम लिए बैठा हूँ सद्य 
आषाड़ में मुझे लिखना है बरखा का पद्य

क्या लिखूं क्या लिखूं समझ ना पाऊँ रे 
हताश बैठा हूँ और देखूं बाहर रे 

घनघटा सारादिन नभ में बादल दुरंत 
गीली-गीली धरती चेहरा सबका चिंतित 

नही है काम घर के अन्दर कट गया सारादिन 
बच्चों के फुटबोल पर पानी पड़ गया रिमझिम 

बाबुओं के चहरे पर नही है वो स्फूर्ति 
कंधे पर छतरी हाथ में जूता किंकर्तव्य विमूढ़ मूर्ती 

कही पर है घुटने तक पानी कही है घना कर्दम 
फिसलने का डर है यहाँ लोग गिरे हरदम 

मेढकों का महासभा आह्लाद से गदगद 
रातभर  गाना चले अतिशय बदखद

भ्रमर कहे…………


red roses
गुलाब का फूल खिला है इधर 
मधु  मत जाओ रे 
फूलों से शहद लेते हुए कहीं 
तुम  काँटों से आहत न हो रे 


इधर है बेला उधर है चम्पा 
विविध फूल है सर्वत्र 
व्यथा कथा अपने मन की 
कह दो ये यहाँ है एकत्र 


भ्रमर कहे मै ये जानूं 
इधर बेला है उधर नलिनी 
पर मैं न जाऊं इधर – उधर 
ये नहीं है मेरी संगिनी 


मैं तो अपनी व्यथा-कथा 
बांचुंगा गुलाब के संग 
गर मैं आहत होऊं तो क्या 
सह लूंगा मै काँटों का दंश 




गुरुदेव की रचना से प्रेरित

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जो आनंद है …………



जो आनंद है फूल गंध में 
जो आनंद है पंछी धुन में 
जो आनंद है अरुण आलोक में 
जो आनंद है शिशु के प्राण में 
जिस आनंद से वातास बहे 
जिस आनंद में सागर बहे 
जो आनंद है धूल कण में 
जो आनंद है तृण दल में 
जिस आनंद से आकाश है भरा 
जिस आनंद से भरा है तारा 
जो आनंद है सभी सुख में 
जो आनंद है बहते रक्त-कण में 
वो आनंद मधुर होकर 
तुम्हारे प्राणों पर  पड़े झरकर 
वो आनंद प्रकाश की तरह 
रह जाए तुम्हारे जीवन में भरकर 


कवि श्री सुकुमार राय के कविता से अनुदित

जो आनंद है …………



जो आनंद है फूल गंध में 
जो आनंद है पंछी धुन में 
जो आनंद है अरुण आलोक में 
जो आनंद है शिशु के प्राण में 
जिस आनंद से वातास बहे 
जिस आनंद में सागर बहे 
जो आनंद है धूल कण में 
जो आनंद है तृण दल में 
जिस आनंद से आकाश है भरा 
जिस आनंद से भरा है तारा 
जो आनंद है सभी सुख में 
जो आनंद है बहते रक्त-कण में 
वो आनंद मधुर होकर 
तुम्हारे प्राणों पर  पड़े झरकर 
वो आनंद प्रकाश की तरह 
रह जाए तुम्हारे जीवन में भरकर 


कवि श्री सुकुमार राय के कविता से अनुदित 

छोटा सा,एक रत्ती ,चूहा………..


  छोटा सा,एक रत्ती ,चूहा एक नन्हा
आँखे अभी खुली नही एकदम काना

टूटा एक दराज का जाली से भरा कोने में
माँ के सीने से चिपक कर उनकी बाते सुने रे

जैसे ही उसकी बंद आँखे खुली दराज के अन्दर
देखा बंद है कमरा उसका लकड़ी का है चद्दर

खोलकर अपने गोल-गोल आँखे देख दराज को बोला
बाप  रे बाप!ये धरती सचमुच है कितना ss बड़ा

कवी सुकुमार राय द्वारा रचित कविता का अनुवाद