Archive for the ‘gulzar’ Category

आसमानी रंग है ….गुलज़ार



लबों से….gulzar


लबों से  चूम  लो , आँखों  से  थाम  लो  मुझको 
तुम्ही से जन्मू तो शायद मुझे पनाह मिले

दो सौंधे सौंधे से जिस्म जिस वक़्त एक मुठी में सो रहे थे
बता तो उस वक़्त मैं कहा था , बता तो उस वक़्त तू कहा थी

मैं आरजू की तपिश में पिघल रही थी कही
तुम्हारे जिस्म से होकर निकल रही थी कही
बड़े हसीं थे जो रह में गुनाह मिले
तुम्ही से जन्मू तो शायद .........

तुम्हारी लौ को पकड के जलने की आरजू में
जब अपने ही आप से लिपट के सुलग रहा था
बता तो उस वक़्त मैं कहाँ था , बता तो उस वक़्त तू कहाँ थी

तुम्हारी  आँखों  के  साहिल  से  दूर  दूर  कहीं 
मैं  ढूँढती थी  मिले  खुश्बुओ  का  नूर  कहीं 
वहीँ रुकी हूँ जहाँ से तुम्हारी राह मिले
तुम्ही से जन्मू तो शायद ..


शाम से आंख में……


 शाम से आंख में नमी सी है,
 आज फिर आपकी कमी सी है.

 दफन कर दो हमें तो साँस आये,
 देर से सांस कुछ थमी सी है ;

कौन पथरा गया है आँखों में ?
बर्फ पलकों में तो जमी सी है

 शाम से आंख में नमी सी है ,
 आज फिर आपकी कमी सी है

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जाने दो मुझे-गुलज़ार


जाने दो मुझे जाने दो
जाने दो मुझे जाने दो
रंजिशें या गिले, वफ़ा के सिले
जो गये जाने दो
जाने दो मुझे जाने दो
जाने दो मुझे जाने दो

थोड़ी ख़लिश होगी, थोड़ा सा ग़म होगा
तन्हाई तो होगी, एह्सास कम होगा
गहरी ख़राशों की गहरी निशानियाँ हैं
चेहरे के नीचे कितनी सारी कहानियाँ हैं
माजी के सिलसिले, जा चुके जाने दो
ना आ आ..

उम्मीद-ओ-शौक़ सारे लौटा रही हूँ मैं
रुसवाई थोड़ी सी ले जा रही हूँ मैं
बासी दिलासों की शब तो गुज़ार आये
आँखों से गर्द सारी रोके उतार आये
आँखों के बुल्बुले बह गये, जाने दो
ना आ आ..

			

दिल पडोसी है-गुलज़ार


रिश्ते बनते है बड़े धीरे से 
    बनने भी दे 
कच्चे लम्हें को ज़रा शाख़ पे 
    पकने दे दे 

एक चिंगारी का उड़ना था कि
    पर काट दिए 
ओ आंच आई तो ज़रा आग को 
    जलने दे दे 
कच्चे लम्हें को ज़रा शाख़ पे 
    पकने दे दे 

एक ही लम्हे पे इक साथ 
    गिरे थे दोनों 
ओ खुद संभल के या ज़रा मुझको 
    सँभालने दे दे 
कच्चे लम्हें को ज़रा शाख़ पे 
    पकने दे दे 

kashmakash…gulzar


तेरी सीमाए कोई नही है 

बहते जाना बहते जाना है 
दर्द ही दर्द है सहते रहना 
सहते जाना है 
तेरे होते दर्द नहीं था 
दिन का चेहरा ज़र्द नहीं था 
तुमसे रूठ के मरते रहना 
मरते रहना है 
तेरी सीमाए……
मैं आधी अधूरी बैठी किनारे 
नदिया-नदिया आंसू आंसू रोना है 
बातों पे रोना नैनो की जुबानी 
रात दिन कहते रहना है 
आग अन्दर की कोई न देखे 
पलक झपकते तुम जो देखो 
तुझको  पाना तुझको  छूना 
मुक्ति  का पाना है