Archive for the ‘hindi poems’ Category

पर्वत कहे




कभी  मै  भी  था  हरा  भरा

मुझमे था कई जीवो का बसेरा

नदियाँ,झरना ,पेड़ ,पौधे

इन सबसे ही था मै भरा


पर इंसानों को ये न भाया

जीवो को मैंने है क्यों पाला

पशुओं की पशुता वो सह ना पाए

पशुओं की भाषा समझ न पाए


कटते चले गए जंगल  पहाड़-पर्वत

सूखी नदियाँ ,झरने  अरे!ये किसकी आह्ट

ओ हो! ये तो इन्सां है जो बुद्धजीवी है कहलाता

और हरे रंग को पीले में परिवर्तित है कर सकता


आखिर उसकी बुद्धि ने ये रंग दिखाया

हरी-भारी हरियाली को पीले रेगिस्तान में बदल डाला

न रहे पशु-पक्षी न ही जानवर

अब इन्सां भी नही आते जो गए थे ये काम कर

उन्हें अब क्या मिलेगा इस मरूभूमि में

उनको चाहिए एक और हरियाली

जिसे बदलना है पीले रेगिस्तान में

गिरगिट इन्सां को रंग बदलना आता है

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रात का सूनापन


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रात का सूनापन

मेरी जिन्दगी को सताए

दिन का उजाला भी

मेरे मन को भरमाये

क्यों इस जिन्दगी में

सूनापन पसर गया

खिलखिलाती ये जिन्दगी

गम में बदल गया

आना मेरी जिन्दगी में तेरा

एक नया सुबह था

वो रात भी नयी थी

वो वक्त खुशगवार था

वो हाथ पकड़ कर चलना

खिली चांदनी रात में

सुबह का रहता था इंतज़ार

मिलने की आस में

पर जाने वो हसीं पल

मुझसे क्यों छिन गया

जो थे इतने पास-पास

वो अजनबी सा बन गया

मेरे अनुरागी मन को

बैरागी बना दिया

रोग प्रेम का है ही ऐसा

कभी दिल बहल गया

कभी दिल दहल गया