Archive for the ‘rishto par kavita’ Category

माथे की लकीरों में


माथे की लकीरों में बसा है 
तज़ुर्बा – ए -ज़िन्दग़ी 
यूं ही नहीं बने हैं 
ज़ुल्फ़-ए-सादगी ॥ 

ख़्वाहिशों से भरा घर 
मुक़म्मल हो नहीं सकता 
बहुत सी ठोकरें खाकर 
सम्भला है ज़िन्दगी ॥ 

अरमान अपने भुलाकर ही 
पाया है अपनों का प्यार 
हसरतें अपनी छुपाकर ही 
मिली है खुशियां हज़ार ॥ 

हम बे मुरव्वत मुरादबीं 
अपने इरादों को मसलकर 
अपनों में बसे अपनों की 
अपनीयत ढूंढते है ॥ 


वो दिन बारिश के…..












याद है वो दिन बारिश के ?
जब भी निकले- छाते को बंद कर  –
लटकाए से घूमा करते थे –


भींगना था पर पानी में ही नही ,
तुम्हारे साथ बीते हुए पलों के
 बौछारों में –

सनसनाती हवाएं , सोंधी सी 
मिटटी की खुशबू , बताये देती थी ,
मौसम भींगा है –

बहुत देर तक – चुपचाप-जाते हुए 
लम्हों को देखा करते थे – कोशिश थी –
पकड़ने की-

वक्त अपने वक्त के हिसाब से –
वक्त दिखाकर चला गया-हम लम्हों –
को ढूँढ़ते रह गए –

रास्ते अब भी वहीं है –
बारिश के दिनों में भींगती हुई –      
बस दो हाथ अलग हुए ॥ 

धन्य हुई मै


आजन्म संगति की अपेक्षा प्रिये-
गुण–दोषों सहित स्वीकार्य 
हुई हूँ–धन्य हुई मै ,
खींचा है आपके प्रेम ने मुझे 
सींचा है आपने  सपनो को मेरे 
प्रेम की ये परिभाषा 
आपने है सिखाया 
प्रिये ! हमारा अस्तित्व इस 
दुनिया में रहेंगे क़यामत तक 
शपथ है मेरी मै  न जाऊंगी 
रह न पाऊँगी 
देखे बिना आपके एक झलक 
सात जन्मो से बंधी हूँ मै 
आगे सात जन्मो तक 
सात फेरे के बंधन है 
मै न जाऊंगी 
तोड़कर ये बंधन 
प्राण न्योछावर है आप पर 
आपसे ही सीखा है 
प्रेम की परिभाषा 
धन्य हुई मै ।।

ये चीत्कार !


ये चीत्कार !
ये हाहाकार !
ये संहार !!!    क्यों ?


ये संत्रास ! 
ये परिहास !
सब बदहवास ! क्यों?


ये वारदात !
ये मारकाट !
सब बरबाद ! क्यों?




प्रशासन हाय !
नाकामी दर्शाय !
नाकाबिल ये !   क्यों??


देश है त्रस्त !
लुटेरे है मस्त !
अनाचार ज़बरदस्त ! क्यों?


कोई तो बताये !
कौन है सहाय!
अब सहा न जाए !   यूं ।।

रिश्ते… खट्टे-मीठे


रिश्तो में क्या रखा है –
आदम-जात का धोखा है ,
जुड़ना है गर रिश्ते संग
टूटन का दर्द सहना है ।।


रिश्ते है ख्वाब  मानिंद –
आज सच कल धोखा है ,
ख़ुशी में छुपा वो दर्द
गम के पटल पर दीखता है ।।






सुकून है गुमनामी में-
रिश्ते का घाव रिस्ता है ,
नफरत औ प्यार का खिचड़ी बस-
पल-पल दर्द चुभोता है ।।


पर ये खट्टे रिश्ते भी-
मीठे फल दे जाते है,
कुछ मासूम-चंचल रिश्ते
जीने को उकसाते है ।।


कुछ उलझन ज़िन्दगी की
पल में ये सुलझाते है,
अपने-पराये से ये रिश्ते
जीने का मकसद दे जाते है ।।