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गीता का सार



यदि हम गीता को पुण्य भूमि भारत वर्ष की वांग्मय आत्मा कहें तो निश्चय ही अत्युक्ति न होगी . अपौरुषेय वेद-चतुष्टय के बाद गीता ही ऐसा ग्रन्थ है जिसकी प्रमाणिकता और लोकप्रियता का प्रभाव भारतीय जनमानस पर अत्यधिक है . गीता की महत्ता इससे और भी बढ़ जाती है जब हम देखते है की प्राचीन भारत के शंकर ,रामानुज सदृश आचार्य से लेकर अर्वाचीन भारत के तिलक,अरविन्द तक ने गेट पर भाष्य, टीका, विवरण,व्याख्या,विमर्श आदि का प्रणयन किया और वैसा करने में अपनी-अपनी लेखनी को सार्थक समझा . जैसे सप्तशती चंडी को मार्कंडेय पुराण का एक क्षुद्र अंश होते हुए भी , एक पृथक ग्रन्थ के रूप में मान्यता प्राप्त है ,ठीक उसी प्रकार सप्तशती गीता भी शतसहस्री संहिता महाभारत का एक क्षुद्रातीक्षुद्र अंश होते हुए भी एक पृथक ग्रन्थ के रूप में स्वीकृत है.गीता आज से कितने सहस्र वर्ष पूर्व गाये गए थे – यह ऐतिहासिकों की खोज का विषय है,किन्तु उन शाश्वत उदार प्राणियों का प्रभाव भारतीय लोक मानस पर आज भी उतना भी बना हुआ है जितना अतीत में था .गीता की लोकप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि भारत भूमि के जो नागरिक पूर्णतया निरक्षर भी है वो भी गीता नाम के दो अक्षरों से अवश्यमेव परिचित है और उसकी शाश्वत उदार वाणियों के मूल भावों की न्यूनाधिक धारणा भी रखती है .
जैसा कि सर्वविदित है प्राचीन आचार्यों ने आर्यों को मुख्यत: ४ वर्णों में विभाजित किया है -ब्राहमण , क्षत्रिय , वैश्य , शुद्र .
इन चार में से प्रथम तीन वर्ण को द्विजाति व चतुर्थ को एकजाति कहा जाता है . शास्त्र कारों ने प्रत्येक वर्ण के लिए पृथक-पृथक कर्मनुशासन भी किया है . क्षत्रिय वर्ण के लिए कर्मविधान करते हुए गीताकार ने कहा है –
शौर्यं तेजो धृतिर्दक्ष्यम युद्धे चाप्यपलायनम .
दान्मीश्वर भावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावधम

शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध से अपलायन, दान और ईश्वरभाव-ये सात क्षत्रिय वरना के लिए स्वभावध कर्म है

गीताकार के पूर्वोधृत वचन पर यदि हम विश्लेष्णात्मक दृष्टि डाले तो देखेंगे कि छात्रवृत्ति के साथ योद्धावृत्ति का अविच्छेद्य सम्पर्क माना गया है . शौर्यतेज,धृति (अल्पाधिक जय-पराजय में धैर्य न खोना ), दाक्ष्य (रणनीति निपुणता )युद्ध से अपलायन , दाम ( शत्रु वर्ग के प्रति प्रयोज्य साम,दाम,दंड ,भेद चतुर्विध राजनयिक उपायों में एक )और ईश्वरभाव (प्रभुता कि शक्ति )ये सातों क्षात्रवृत्तियां अल्प या अधिक अथवा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से योद्धावृत्ति से संपृक्त है ही . आज जब हम भारतवर्ष के कतिपय राजनयिक और सांस्कृतिक नेतायों को यह कहते हुए पाते है युद्ध या योद्धा मानव जीवन के लिए एक अनावश्यक तत्व है,स्वभावत: हमाती दृष्टि पूर्वोक्त गीतोक्ति के प्रति बलात आकृष्ट हो जाता है . एक ओर तो गीतकार कहते है कि मानव जाति में केवल एक वर्ण विशेष केवल युद्ध या योद्धावृत्ति के लिए ही उत्पन्न हुआ है,दूसरी ओर आधुनिक नेता युद्ध या योद्धावृत्ति को मानव जाति के लिए एक अनावश्यक तत्व मानते है .वसे तो जब कभी नेतागण मानवजाति के प्रति युद्ध या योद्धावृत्ति कि विपज्जनता के विषय में बोलते है तब वे बातें तो बहुत ही पुष्पित , पल्लवित एवं सुन्दर प्रतीत होता है किन्तु यदि हम ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विचार करने का प्रयास करें तो देखेंगें कि मानव सृष्टि के आदिकाल से लेकर आजतक मानव जाति के अस्तित्व को जिस तत्वा ने सुरक्षित रखा है , उसका नाम है युद्ध या संग्राम और इस युद्ध या संग्राम के वांग्मय तत्व को जिसने रूप दिया है , उसका नाम है योद्धा या सैनिक ! विश्व का अतीत इतिहास योद्धाओं या सैनिकों का ही इतिहास रहा है , और यदि हम इसी अतीत इतिहास के आधार पर विचार करें तो यह निश्चित है कि विश्व का भावी इतिहास भी सैनिक या योद्धाओं का ही इतिहास होगा और होकर रहेगा .
पोर्वोक्ता गीतोक्ति से इतना तो अनायास ही सिद्ध हो जाता है युद्धावृत्ति या योद्धावृत्ति क्षात्र वर्ण के लिए क्षात्र धर्मं का एक अनिवार्य अंग है .

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भारत के चंद्रमा मिशन ‘चंद्रयान 1’ में लगे नासा के एक रडार की मदद से वैज्ञानिकों ने चंद्रमा के उत्तरी ध्रुव पर बर्फ से भरे 40 गड्ढों का पता लगाया है।

नासा के हल्के वजन के सिंथेटिक अपर्चर वाले रडार मिनी एसएआर यंत्र ने 40 से ज्यादा बर्फ वाले गड्ढों का पता लगाया। इन गड्ढों का आकार 2 से 15 किलोमीटर तक के व्यास का था।

नासा ने अपने एक वक्तव्य में कहा है कि इस खोज से आगे के मिशन को नई खोजों के लिए नया लक्ष्य मिलेगा। साथ ही नासा ने यह भी संभावना जताई है कि चाँद के इन गड्ढों में कम से कम 60 करोड़ मिट्रिक टन पानी की बर्फ हो सकती है।

लूनार और प्लानेटरी इंस्टिट्यूट के मिनी एसएआर प्रयोग के मुख्य अनुसंधानकर्ता पॉल स्पूदिस ने कल कहा चंद्रमा से जुड़े मिशन में लगे यंत्रों से हमें जो तस्वरें मिली हैं, उनसे मालूम चलता है कि चाँद पर पानी का निर्माण, जमाव, भंडारण और पुनर्धारण हो रहा है।

उन्होंने कहा इन नए खोजों से पता चलता है कि पहले की सोच से उलट चंद्रमा वैज्ञानिक अनुसंधान और खोज के लिए और भी ज्यादा रोचक लक्ष्य है।

चंद्रयान 1 के साथ गए मिनी एसएअसा ने चंद्रमा के छायादार ध्रुवीय गड्ढों की वे तस्वीरें लीं, जो धरती से दृश्य नहीं थे।

सेसल सुनने लगी और……….


सेसल सुनने लगी और कमाल डा. बी.अल. कपूर मेमोरिअल हॉस्पिटल के डाक्टरों का है . जहाँ एक तरफ डोक्टेरों पर अवहेलना का आरोप लगता रहता है वहीँ कभी कभी ये भगवान की तरह काम करते है . एक जन्म से बहरा बच्चा जिसके माँ बाप निराश हो चुके थे एक चिप के सहारे उस बच्चे को सुनने लायक बना दिया गया . इस ओपरेशन से जुड़े सभी डॉक्टरों को मेरी हार्दिक बधाई

A five headed snake found in Infosys Campus, Mangalore, Karnataka Inbox X




मर जाउंगी सूख-सूख कर ( गुरुदेव की रचना से प्रेरित, )


हृदय मेरा कोमल अति सहा न पाए भानु ज्योति
प्रकाश यदि स्पर्श करे मरे हाय शर्म से
भ्रमर भी यदि पास आये भयातुर आँखे बंद हो जाए
भूमिसात हम हो जाए व्याकुल हुए शर्म से
कोमल तन को पवन जो छुए तन से फिर पपड़ी सा निकले
पत्तों के बीच तन को ढककर खड़े है छुप – छुप के
अँधेरा इस वन में ये रूप की हंसी उडेलूंगी मै रूप की हंसी
इस अँधेरे वन के अंक में मर जाउंगी सूख-सूख कर

प्रेमगीत( गुरुदेव की रचना से प्रेरित )


कई बार सोचा मैंने अपने आपको भूलकर
तुम्हारे चरणों पर समर्पित करून अपने हृदय को खोलकर

मन ही मन सोचता हूँ दूर तुमसे मैं रहूँ
जीवन भर एकाकी रहकर मैं अदृश्य हो जाऊं

कोई समझे न ये मेरी गहरी प्रणय कथा
कोई जाने न ये मेरी अश्रु पूर्ण हृदय -व्यथा

आज कैसे मैं ये बातें सबके समक्ष कहूं
प्रेम कितना तुमसे है ये कैसे उजागर करूँ

कई बार सोचा मैंने अपने आपको भूलकर
तुम्हारे चरणों पर समर्पित करूँ अपने हृदय को खोलकर

मानव अपने पुरे जीवन काल में…………


मानव अपने पुरे जीवन काल में कई अवस्थाओं से होकर  गुज़रता  है . जिसमे ब्ल्यावास्था वो अवस्था है जिसमे शिशु संपूर्ण रूप से अपने माता – पिता पर निर्भर रहता है  अर्थात अभिभावक अपने अनुसार शिशु का पालन पोषण करता है . तत्पश्चात वह बाल्यावस्था में प्रवेश करता है और  अपनी पसंद – नापसंद दर्ज कराने की कोशिश करता है . माता-पिता के ना सुनना पसंद नशीं करता सोचता है मम्मी पापा गलत है उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए .और इस तरह किशोरावस्था तक आते-आते वह माता-पिता हो गलत ठहराने को अपनी शान समझता है चूँकि वो स्वयं दिग्भ्रमित रहता है इसलिए बड़ों की हर बातें उसे नागवार लगती है और सोचता है की कितने पुराने खयालात है इनके मैं अपने बच्चों के साथ ऐसा हरगिज़ नहीं करूंगा . और इसतरह वह युवावस्था की ओर बढ़ जाता है . इस अवस्था में वह पढ़ाई और नौकरी को लेकर इस कदर उलझा रहता है की माँ बाप की हर बातें उसे उपदेश लगता है और और झुंझलाकर कहता है अब दिन पुराने जैसे नहीं रहे मुझे नहीं आपको अपने आप को बदलना पडेगा . लेकिन जैसे-जैसे वह गृहस्थ  जीवन की ओर अग्रसर होता है उसे अपने माँ बाप सही लगने लगते है . उनके हर आदर्ष अपनाने के लिए अपने बच्चों को प्रोत्साहित किया जाता है . और उमरा बढ़ने के साथ-साथ वह मानने लगता है की वो ही गलत था बल्कि उसके माँ-बाप ही सही थे .