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सावन आयो रे…..













बादलों की गर्जना में
नीर भी है पीर भी
कौन से वो आंसू है वो !
खार भी है सार भी।। 

वेदना के अश्रु है या
शबनमी बूंदों का खेल
या धरा पर उतरती है
झर झर झरनों का बेल ॥  

गात,पात,घाट,बाट 

प्लावित तन छलछलात 
विरही हृदय छटपटाये 
प्रणय सुर स्मरण आये ॥ 

सप्तरंग रंग बिखेरे 
सावन संग-संग ले फेरे 
ग्रीष्म-ताप भी भीगे रे  
झूम के सावन आये  रे ॥ 


देख रही थी एकटक…..

















देख रही थी एकटक सितारों को 
आसमान पिघलने लगा ,
चाँद की चांदनी पड़ी मद्धिम –
बादल छाने लगा ।।


दूर गगन में तारों की महफ़िल 
एकाएक सजने लगी 
बादल का  ओट  लेकर फिर से 
रौशनी मचलने लगी ।।


देख मचलना तारों का 
इक आस सी जगी 
सुना है टूटता तारा 
करता है मुराद पूरी ।।


थाह नहीं मेरे जज्बातों का 
बादल से शिकायत कर बैठी 
छंट गए बादल खुला आसमान 
रौशनी फिर चढ़ बैठी ।।

ये काली घटा ने……



ये काली घटा ने देखो
क्या रंग दिखाया
नाच उठा मन मेरा
हृदय ने गीत गाया
सूखी नदियाँ प्लावित हुई
जीवन लहलहाया
दादुर,कोयल,तोता,मैना ने
गीत गुनगुनाया
तप्त धरती शीतल हुई
बूंदे टपटपाया
धरती ने आसमान को छोड़
बादल को गले लगाया
रवि ज्योति मंद पड़ा
मेघ गड़गड़ाया
नृत्य मयूर का देख
ये मन मुस्कराया